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Friday, June 12, 2026
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प्राकृतिक खेती ही कृषि और पर्यावरण को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम : राधामोहन

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-खेत बचाओ अभियान से किसानों की आय बढ़ेगी, मिट्टी और पर्यावरण भी होंगे सुरक्षित

-जिला स्तरीय प्राकृतिक खेती सम्मेलन सह शारदीय खरीफ महाअभियान 2026 आयोजित

माला सिन्हा

पीपराकोठी: प्राकृतिक खेती ही कृषि और पर्यावरण को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है. रसायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति, जल गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है. ऐसे समय में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बनकर उभरी है. उक्त बाते कृषि विज्ञान केंद्र के अटल सभागार में शुक्रवार को आयोजित जिला स्तरीय प्राकृतिक खेती सम्मेलन सह शारदीय खरीफ महाअभियान 2026 के दौरान पूर्व केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री सह सांसद राधामोहन सिंह ने कही. सम्मेलन का उद्घाटन पूर्व केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री सह मोतिहारी सांसद राधामोहन सिंह, वन एवं पर्यावरण मंत्री रामचंद्र प्रसाद, विधायक प्रमोद कुमार, कृष्णनंदन पासवान, शालिनी मिश्रा, ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया. इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत मोमेंटो एवं अंगवस्त्र भेंट कर किया गया. आगे पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री श्री सिंह ने कहा कि भारत सरकार द्वारा एक से 30 जून तक राष्ट्रीय स्तर पर खेत बचाओ अभियान चलाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित पोषण प्रबंधन एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना है. उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती हमारी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा रही है. पद्मश्री सुभाष पालेकर द्वारा विकसित प्राकृतिक खेती मॉडल में जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, अग्नियास्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे जैविक आदानों का उपयोग किया जाता है, जिससे खेती की लागत घटती है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है. सांसद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्राकृतिक एवं शून्य लागत खेती को विशेष प्रोत्साहन दे रहे हैं. इसका उद्देश्य केवल खेती की लागत कम करना नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत को पुनर्जीवित करना, पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना तथा किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है. उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, पीपराकोठी की सराहना करते हुए कहा कि वर्ष 2022 से यहां प्राकृतिक खेती परियोजना के तहत हजारों किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है. वर्ष 2025-26 में 1,116 किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया, जबकि 30 कृषि सखियों को विशेष प्रशिक्षण देकर जिले के 15 प्राकृतिक खेती क्लस्टरों में कार्यरत किया गया है. इन कृषि सखियों ने अब तक 1,875 किसानों को प्रशिक्षित किया है. कहा कि पूर्वी चंपारण कृषि प्रधान जिला है और यहां के मेहनती किसान प्राकृतिक खेती को जन- आंदोलन का स्वरूप दे सकते हैं. यदि प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए तो किसानों की आय बढ़ेगी, साथ ही मिट्टी, जल और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेंगे. उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान को अपने खेतों में लागू करें तथा अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करें. वहीं बिहार सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्री रामचंद्र प्रसाद ने संबोधित करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती केवल कृषि उत्पादन की पद्धति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा का एक प्रभावी माध्यम है. रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता घट रही है, जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और जैव विविधता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. ऐसे समय में प्राकृतिक खेती एक टिकाऊ और व्यवहारिक विकल्प के रूप में उभर रही है. प्राकृतिक खेती से भूमि की सेहत में सुधार होता है, उत्पादन लागत कम होती है तथा किसानों को गुणवत्तापूर्ण और विषमुक्त उत्पाद प्राप्त होते हैं. यह खेती जल संरक्षण, जैविक संतुलन और पर्यावरण सुरक्षा को भी बढ़ावा देती है. राज्य सरकार किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने के लिए विभिन्न योजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और तकनीकी सहयोग के माध्यम से निरंतर प्रयास कर रही है. मौके पर मुख्य रूप से विधायक प्रमोद कुमार, सचिन्द्र प्रसाद सिंह, श्यामबाबू प्रसाद यादव, शालिनी मिश्रा, लालबाबू प्रसाद, कृष्णनंदन पासवान, पूर्व विधायक सुनील मणि तिवारी, उपमेयर डा लालबाबू प्रसाद गुप्ता, पवन राज, केविके प्रमुख डा अरविन्द कुमार सिंह, निदेशक डा राघवेंद्र सिंह, डीएओ मनीष कुमार, राजू सिंह पटेल, राजकिशोर सिंह, सहित हजारों किसान, अधिकारी, वैज्ञानिक मौजूद थे.

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