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Wednesday, July 15, 2026
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जब मंच पर टकराईं इच्छाएँ, रिश्ते और विरासत — ‘लवार जीवड़ा रे’ ने छोड़ी गहरी छाप

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नोएडा : शुक्रवार की शाम द ट्रायलॉग कंपनी, मयूर विहार फेज-1 का मंच केवल एक नाट्य प्रस्तुति का मंच नहीं था, बल्कि मानवीय मन की उन जटिल गुत्थियों का आईना बन गया, जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। 

नाटक ‘लवार जीवड़ा रे’ ने दर्शकों को रिश्तों, स्वामित्व, प्रेम और महत्वाकांक्षा के ऐसे संसार में ले जाकर खड़ा कर दिया, जहाँ हर पात्र अपने भीतर और अपने परिवेश से संघर्ष करता दिखाई देता है।विश्वविख्यात नाटककार यूजीन ओ’नील की कालजयी कृति Desire Under the Elms के हिंदी रूपांतरण पर आधारित इस प्रस्तुति ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न दर्शकों के सामने रखा जब इच्छाएँ मर्यादाओं से बड़ी हो जाती हैं, तब परिवार और रिश्तों का क्या होता है? कथा के आगे बढ़ने के साथ दर्शक पात्रों के भीतर चल रहे भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संघर्षों के साक्षी बनते गए। विरासत की लालसा, रिश्तों की उलझन और मनुष्य की स्वाभाविक कामनाओं का द्वंद्व मंच पर इतनी सजीवता से उभरा कि कई क्षणों में सभागार गहरे सन्नाटे में डूब गया। नाटक ने पारिवारिक संबंधों, उत्तराधिकार की राजनीति और मानवीय इच्छाओं के टकराव को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हुए दर्शकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।मुख्य भूमिकाओं में दिलशाद ने केवल सिंह, श्रद्धा पांडे ने इमली तथा कृषांश गर्ग ने सोना की भूमिका निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया। वहीं अनुरूप गौतम (पीतल), अविनाश चौधरी (एहसान सिंह) और अन्य पात्रों में अमित यादव, सुजल तथा प्रवीण कुमार ने भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। कलाकारों की संवाद-अभिव्यक्ति, देहभाषा और भाव-प्रस्तुति ने पात्रों को जीवंत बना दिया। युवा कलाकारों ने अपने पात्रों को केवल निभाया नहीं, बल्कि उन्हें मंच पर पूरी संवेदनशीलता के साथ जिया। नाटक की परिकल्पना एवं निर्देशन युवा रंगकर्मी और स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय, देहरादून के एम.ए. चतुर्थ सेमेस्टर के छात्र सारांश भट्ट ने किया। लगभग 45 दिनों की रंगमंचीय कार्यशाला में तैयार की गई इस प्रस्तुति में अभिनय, मंच अनुशासन और नाट्य शिल्प का संतुलित समन्वय देखने को मिला। सामाजिक सरोकारों को कला के माध्यम से अभिव्यक्त करने की निर्देशक की दृष्टि नाटक के प्रत्येक दृश्य में परिलक्षित हुई। प्रस्तुति की तकनीकी पक्ष ने भी दर्शकों को प्रभावित किया। कुणाल सिन्हा की प्रकाश परिकल्पना ने नाटक के भावबोध को सशक्त बनाया, जबकि राहुल सिंह (रामाली) के संगीत संचालन ने कथा के वातावरण को और अधिक प्रभावशाली बनाया। मंच-सज्जा की सादगी, प्रकाश योजना और कलाकारों की अभिनय क्षमता ने कथा के प्रभाव को और अधिक प्रखर बना दिया। नाटक के समापन के साथ ही सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। प्रस्तुति के दौरान वरिष्ठ रंगकर्मी सुधीर रिखारी, कथक नृत्यांगना रिद्धिमा बग्गा सहित अनेक कला एवं रंगमंच प्रेमी उपस्थित रहे। अतिथियों ने नाटक की विषयवस्तु, कलाकारों के अभिनय और निर्देशन की सराहना की।

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