मोतिहारी, राज नंदनी जायसवाल।
आज महिलाएँ शिक्षा, विज्ञान, सेना, खेल, राजनीति, व्यापार और हर दूसरे क्षेत्र में अपनी मेहनत और प्रतिभा से नई पहचान बना रही हैं। वे पढ़-लिख रही हैं, नौकरी कर रही हैं, परिवार की आर्थिक स्थिति को मज़बूत बना रही हैं और समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। फिर भी आज एक सवाल हमारे सामने है—क्या हमारी सोच वास्तव में बदली है?
आज भी कई घरों में बेटियों को बचपन से खाना बनाना, सफ़ाई करना और घर के दूसरे काम सिखाए जाते हैं। वहीं बेटों से अक्सर सिर्फ़ पढ़ाई करने और भविष्य में कमाने की उम्मीद की जाती है। यही सोच आगे चलकर असमानता पैदा करती है। जब बेटियाँ पढ़-लिखकर नौकरी करती हैं और शादी के बाद नए परिवार में जाती हैं, तब उनसे नौकरी के साथ-साथ घर की पूरी ज़िम्मेदारी निभाने की भी उम्मीद की जाती है। इससे उन पर मानसिक और शारीरिक दोनों तरह का दबाव बढ़ जाता है।
घर की ज़िम्मेदारी केवल महिला की नहीं होती। पति और पत्नी दोनों मिलकर घर और परिवार को संभालते हैं, इसलिए दोनों को बराबर ज़िम्मेदारियाँ निभानी चाहिए। जब पति घर के कामों में अपनी पत्नी का साथ देता है, तो इससे सिर्फ़ उसका काम कम नहीं होता, बल्कि उसे अपने करियर और सपनों को आगे बढ़ाने का भी अवसर मिलता है। इससे परिवार में प्यार, सम्मान और आपसी समझ भी बढ़ती है।
लेकिन जब घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ केवल महिला पर आ जाती हैं, तो उसका असर उसकी सेहत और मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। पूरे दिन नौकरी करने के बाद भी उसे खाना बनाना, सफ़ाई करना, बच्चों की देखभाल करना और परिवार के दूसरे काम करने पड़ते हैं। कई बार वह थकी होने या बीमार होने के बावजूद आराम नहीं कर पाती, क्योंकि घर के काम रुकते नहीं हैं। इतना ही नहीं, मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान जब महिलाओं को आराम और देखभाल की ज़रूरत होती है, तब भी कई महिलाओं से बिना रुके सभी घरेलू काम करने की उम्मीद की जाती है। दर्द, कमजोरी और थकान के बावजूद वे परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाती रहती हैं। लगातार बढ़ता यह शारीरिक और मानसिक बोझ तनाव, चिंता और कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। ऐसे समय में यदि परिवार, खासकर पति, उनका साथ दे और घर के कामों में बराबर की भागीदारी निभाए, तो महिला न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ रहेगी, बल्कि मानसिक रूप से भी अधिक सशक्त महसूस करेगी।
इस बदलाव की शुरुआत बचपन से होनी चाहिए। माता-पिता को अपने बेटों और बेटियों, दोनों को घर के काम सिखाने चाहिए। खाना बनाना, सफ़ाई करना, अपने सामान की देखभाल करना और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी जीवन कौशल हैं। जब बच्चों को बचपन से समानता का महत्व सिखाया जाएगा, तभी वे बड़े होकर एक बेहतर समाज का निर्माण करेंगे।
सच्ची समानता केवल कानूनों से नहीं आएगी, बल्कि हमारे घरों से शुरू होगी। जब बेटियाँ अपने सपनों को बिना किसी अतिरिक्त बोझ के पूरा कर सकेंगी और बेटे ज़िम्मेदार व सहयोगी जीवनसाथी बनेंगे, तभी एक खुशहाल परिवार और एक समान समाज का सपना सच होगा ।












