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Sunday, June 14, 2026
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एक नई पहल : उद्यानिकी महाविद्यालय ने शुरू की ट्रेलिस सिस्टम पर परवल की खेती

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माला सिन्हा 

पीपराकोठी : परवल बिहार की महत्वपूर्ण सब्जियों में से एक है. हमारा राज्य परवल का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों में है. यहाँ 11,000 हेक्टेयर क्षेत्र में परवल की खेती की जाती है और लगभग 1.13 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होता है. अधिकांश किसान इसकी खेती परंपरागत तरीके से करते हैं, जिसमें परवल की लतरों को जमीन पर फैलने दिया जाता है. इस पद्धति में परिणामस्वरूप खरपतवार के साथ पानी, पोषक तत्व, परागण एवं सूर्य के प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे उत्पादन में कमी आती है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय पिपराकोठी इन समस्याओं के समाधान के लिए ट्रेलिस सिस्टम पर परवल की खेती शुरू की है. इस संबंध में अधिष्ठाता डॉ. कुंदन किशोर ने बताया कि यह यह एक नई पहल है जिसके द्वारा परागण और फल लगने की प्रक्रिया बेहतर होता है, कीड़ों और बीमारियों के असर कम होता है और फलों को मिट्टी के संपर्क में आने से बचाता है. डॉ. राम बाबू शर्मा, सहायक प्राध्यापक ने बताया कि इस प्रणाली में 6-7 फीट के लोहे के खंभों को लगभग 10 से 12 फीट की दूरी पर लगाया जाता है. इसके बाद खंभों के बीच मजबूत तार या प्लास्टिक रस्सी बांधी जाती है. पहली तार जमीन से लगभग 1.5 फीट की ऊँचाई पर तथा उसके ऊपर 1-1 फीट की दूरी पर अन्य तारें लगाई जाती हैं. इस प्रकार 6-7 फीट ऊँचाई तक 4 से 5 समानांतर तारों की पंक्तियाँ बनाई जाती हैं. जब परवल की लतरें बढ़ने लगती हैं, तब उन्हें इन तारों के सहारे ऊपर की ओर चढ़ाया जाता है, जिससे उनका समुचित विकास होता है. पौधों को लगभग 2 से 2.5 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है. चूँकि परवल एक द्विलिंगी फसल है, जिसमें नर एवं मादा फूल अलग-अलग पौधों पर आते हैं, इसलिए अच्छी फलधारण के लिए लगभग 10 मादा पौधों पर 1 नर पौधा अवश्य लगाना चाहिए.

हालांकि ट्रेलिस सिस्टम की लागत अपेक्षाकृत ज़्यादा है, लेकिन यह 20 से ज़्यादा सालों तक चल सकता है. दूसरी ओर, बांस पर आधारित ट्रेनिंग सिस्टम बहुत कम समय तक चलता है और इसे नियमित रूप से बदलने की ज़रूरत होती है. ट्रेलिस प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण लाभ प्रभावी खरपतवार प्रबंधन है. इसके साथ ही पौधों को पर्याप्त वायु संचार एवं सूर्य का प्रकाश मिलता है, जिससे रोगों का प्रकोप कम होता है. फल जमीन के संपर्क में नहीं आते, इसलिए फल सड़न, लतर गलन तथा अन्य मृदाजनित रोगों की संभावना काफी कम हो जाती है. इस सिस्टम में कीट प्रबंधन आसान है. फल साफ-सुथरे, सीधे एवं आकर्षक प्राप्त होते हैं, जिनकी बाजार में अधिक मांग तथा बेहतर कीमत मिलती है. साथ ही, तुड़ाई, रोग निरीक्षण एवं पौध संरक्षण संबंधी कार्य भी सरल और सुविधाजनक हो जाते हैं. ट्रेलिस प्रणाली अपनाने पर परंपरागत पद्धति की तुलना में अधिक उत्पादन तथा बेहतर गुणवत्ता के फल प्राप्त होते हैं. जो आधुनिक सब्ज़ी उत्पादन का एक अहम हिस्सा बन सकता है , जो पैदावार, फल की गुणवत्ता, कीट और बीमारी के प्रबंधन और मुनाफ़े को बढ़ाता है. यह बेल वाली और ऊपर चढ़ने वाली सब्ज़ियों के लिए खास तौर पर फ़ायदेमंद है और प्रिसिज़न व प्रोटेक्टेड खेती के सिस्टम में इसे तेज़ी से अपनाया जा रहा है.

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