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बदलते मानसून में धान की सीधी बुवाई किसानों के लिए उपयोगी तकनीक : डा अरविन्द

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Motihari | माला सिन्हा|

-कम लागत से होती है अच्छी पैदावार।

-बिजड़ा तैयार करने की जरूरत नहीं

 पीपराकोठी। मानसून की देरी, अनियमित वर्षा }और बढ़ती जलवायु अनिश्चितता के कारण जिले में धान की समय पर रोपाई कई बार प्रभावित होती है। मजदूरों की कमी, डीजल और सिंचाई खर्च में वृद्धि तथा रोपाई की बढ़ती लागत ने धान उत्पादन को और महंगा बना दिया है।

इस संबंध में कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख सह प्रधान वैज्ञानिक डा अरविन्द कुमार सिंह ने बताया कि उपयुक्त खेतों में धान की सीधी बुवाई, किसानों के लिए कम लागत, कम पानी और समय बचाने वाली व्यावहारिक तकनीक हो सकती है. इस विधि में नर्सरी तैयार करने, पौध उखाड़ने और रोपाई की आवश्यकता नहीं होती. बीज सीधे मुख्य खेत में बोया जाता है।

दो तरह से कर सकते है सीधी बुआई : प्रधान वैज्ञानिक श्री सिंह बताते है कि पूर्वी चम्पारण में सीधी बुआई मुख्यतः दो प्रकार से अपनाया जा सकता है। पहली विधि हल्का नमी बनाकर धान की सीधी बुआई है, जिसमें सूखे या हल्की नमी वाले समतल खेत में सूखा बीज जीरो-टिल ड्रिल, मल्टी-क्रॉप प्लांटर, राइस-व्हीट सीडर या सीड ड्रिल से लाइन में बोया जाता है।

बीज को 1 से 1.5 सेमी गहराई तक ही डालें। कतार दूरी लगभग 20 सेमी रखें और 25-30 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।

दूसरी विधि हल्का पानी में मसाह कर अंकुरित बुआई है। जिसमें पर्याप्त नमी या हल्के पडल्ड खेत में अंकुरित बीज को ड्रम सीडर या लाइन से बोया जाता है। इसके लिए बीज को 24 घंटे भिगोकर और 24 घंटे अंकुरित कर लेना चाहिए। सीधी बुआई तकनीक मध्यम से निचली भूमि के लिए अधिक उपयुक्त है, जहाँ वर्षा का जल कुछ समय तक उपलब्ध रहता है।

ऊँची भूमि में हल्की मिट्टी और कम नमी के कारण खरपतवारों का प्रकोप अधिक होने से सीधी बुआई का प्रबंधन अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है। खेत का समतलीकरण सीधी बुआई की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार है, जिससे समान अंकुरण एवं बेहतर फसल वृद्धि सुनिश्चित होती है।

खेत का समतलीकरण होना जरूरी :

सीधी बुआई की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार खेत का समतलीकरण और खरपतवार नियंत्रण है. खेत असमतल होने पर कहीं जल-जमाव और कहीं सूखापन होगा, जिससे अंकुरण प्रभावित होगा. बुवाई के बाद पहले 25–30 दिन खेत को खरपतवार मुक्त रखना आवश्यक है. हल्का नमी बनाकर धान की सीधी बुवाई के 1–3 दिन के अंदर उपयुक्त प्री-इमर्जेन्स खरपतवारनाशी प्रेटिलाक्लोर 50 प्रतिशत ईसी 500 मि.ली. प्रति एकड़ का प्रयोग पर्याप्त नमी की स्थिति में किया जा सकता है. इसके बाद 15-20 दिन पर पोस्ट-इमर्जेन्स खरपतवारनाशी बिस्पायरीबैक सोडियम 10 प्रतिशत एलसल 100 मि.ली. एवं पाइराजोसल्फ्यूरॉन एथाइल 40 ग्राम प्रति एकड़ का प्रयोग चौड़ी एवं संकरी पत्ती वाले खरपतवारों के प्रभावी नियंत्रण हेतु किया जा सकता है. किसान खरपतवार की स्थिति देखकर ही कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की सलाह से दवा का चयन करें.

मजदूरों पर निर्भरता घटती है : सीधी बुआई-

मशीनीकरण के लिए अनुकूल तकनीक है. इससे मजदूरों पर निर्भरता घटती है और बड़े क्षेत्र में समय पर बुवाई संभव होती है. बिना पडलिंग के खेती करने से मिट्टी की संरचना, जल प्रवेश, जड़ों की वृद्धि और मृदा स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है. अवशेष जलाने के बजाय खेत में मिलाने या मल्च के रूप में उपयोग करने से मृदा कार्बन बढ़ता है. धान की कटाई जल्दी होने से गेहूँ, मक्का, मसूर, चना, सरसों और आलू जैसी रबी फसलों की समय पर बुवाई संभव होती है. जिले में सीधी बुआई के लिए कम अवधि, अच्छी अंकुरण क्षमता और जलवायु-सहिष्णु किस्मों को प्राथमिकता दें.

अनुशंशित बीज का ही करें उपयोग : निचली भूमि के लिए राजश्री, राजेन्द्र मह्सूरी-1 तथा स्वर्णा सब-1 जैसी लंबी अवधि की किस्में उपयुक्त हैं, जिनकी बुवाई 25 मई से 10 जून के बीच की जा सकती है. मध्यम से ऊँची भूमि के लिए राजेन्द्र श्वेता, राजेन्द्र सरस्वती, स्वर्णा, सबौर हर्षित धान, सबौर अर्धजल तथा विभिन्न संकर (हाइब्रिड) धान किस्में सीधी बुआई तकनीक के लिए उपयुक्त हैं. इनकी बुवाई का उपयुक्त समय 10 जून से 25 जून है. विलंबित मानसून अथवा देर से बुवाई की स्थिति में तुरंता, प्रभात, अंजली, वंदना, सीआर धान-40, डीआरआर धान-44, डीआरआर धान-54 एवं डीआरआर धान-55 जैसी अल्पावधि एवं अपेक्षाकृत सूखा-सहिष्णु किस्में मध्यम एवं ऊँची भूमि के लिए अच्छे विकल्प हैं. इन किस्मों की बुवाई 25 जून से 10 जुलाई तक की जा सकती है, जिससे विलंबित मानसून की स्थिति में भी धान की सफल खेती संभव हो सके. नवीन जलवायु-सहिष्णु विकल्पों में डीआरआर धान 100, जिसे कमला कहा जाता है, और पूसा डीएसटी धान 1 भी उल्लेखनीय हैं; इनके उपयोग से पहले स्थानीय बीज उपलब्धता और कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह अवश्य लें.

वैज्ञानिक की सलाह : केविके के प्रधान वैज्ञानिक सह प्रमुख डा अरविन्द कुमार सिंह बताते है कि निचली व अधिक जल-जमाव वाली भूमि में सीधी बुआई सावधानी से अपनाएँ और ऐसे खेतों में स्थानीय परिस्थिति के अनुसार रोपाई या जलभराव-सहिष्णु किस्मों का चयन करें. किसान स्थानीय परिस्थितियों, भूमि की प्रकृति एवं बीज उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से उपयुक्त किस्म एवं सीधी बुआई विधि का चयन करें, ताकि बदलते मानसून की परिस्थितियों में भी धान उत्पादन को लाभकारी एवं टिकाऊ बनाया जा सके.

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