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Thursday, July 23, 2026
Homeबिहारमोतिहारीसंतुलित उर्वरक उपयोग एवं मृदा स्वास्थ्य जांच जरूरी : अर्पिता

संतुलित उर्वरक उपयोग एवं मृदा स्वास्थ्य जांच जरूरी : अर्पिता

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Motihari | माला सिन्हा।

सही उर्वरक, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान का रखे ख्याल।

पिपराकोठी। कृषि उत्पादन बढ़ाने में उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन लंबे समय से विशेषकर नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों, खासकर यूरिया, के असंतुलित उपयोग के कारण मिट्टी की गुणवत्ता, फसल उत्पादकता और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. बिहार सहित देश के कई हिस्सों में फसलों में पोषक तत्वों का असंतुलन देखने को मिल रहा है, जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है. विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित उर्वरक उपयोग का अर्थ है कि फसल की आवश्यकता, मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की स्थिति तथा अपेक्षित उत्पादन लक्ष्य के अनुसार नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का उचित अनुपात में प्रयोग किया जाए. इस संबंध में कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डा अर्पिता नालिया ने बताया कि मिट्टी में किसी एक पोषक तत्व की अधिकता या कमी फसल की वृद्धि को सीमित कर सकती है. केवल यूरिया के अत्यधिक उपयोग से फसलों के गिरने, कीट एवं रोगों के प्रकोप तथा पोषक तत्व उपयोग दक्षता में कमी जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं. वहीं बिहार के अनेक क्षेत्रों में जिंक, सल्फर और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी सामने आ रही है, जिससे फसल की गुणवत्ता और उपज प्रभावित होती है. कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि वे नियमित रूप से मिट्टी की जांच कराएं और मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसाओं के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करें. नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग करें तथा केवल यूरिया पर निर्भर न रहें. नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों को एक साथ देने के बजाय 2 से 3 किस्तों में प्रयोग करना अधिक लाभकारी माना जाता है. साथ ही तरल एनपीके कंसोर्टिया, नैनो उर्वरकों, गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद तथा जैव उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता है. विशेषज्ञों ने 4आर पोषक तत्व प्रबंधन सिद्धांत—सही उर्वरक, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान—को अपनाने पर जोर दिया है. संतुलित उर्वरक उपयोग से उत्पादन लागत कम होती है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है तथा पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है. किसानों को “जितनी आवश्यकता, उतना उर्वरक” के सिद्धांत पर चलकर वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन अपनाना चाहिए. यही टिकाऊ कृषि, स्वस्थ मिट्टी, अधिक लाभ और कृषि आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव है.

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