New Delhi | NEET का मुद्दा लाखों छात्रों के भविष्य का मुद्दा था। यह आंदोलन छात्रों के लिए शुरू हुआ था—उनके साथ हुए अन्याय के खिलाफ। पेपर लीक कोई नई बात नहीं है। पहले भी ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं। सवाल है कि हर बार सबक क्यों नहीं लिया गया?
हाँ, कार्रवाई हुई। NTA के कई अधिकारियों पर कार्रवाई की गई, जिम्मेदार लोगों को हटाया गया, और यह भी कहा गया कि आने वाले समय में परीक्षा को अधिक सुरक्षित और डिजिटल माध्यम से कराया जाएगा। अगर ऐसा पहले हो सकता था, तो पहले क्यों नहीं हुआ?
लेकिन मेरा सबसे बड़ा सवाल कुछ और है।
क्या यह आंदोलन अब भी NEET के लिए है?
या फिर यह एक राजनीतिक रैली बन चुका है?
आज अलग-अलग राजनीतिक दलों के बड़े नेता मंच पर दिखाई दे रहे हैं। नारों का केंद्र NEET कम और राजनीति ज़्यादा लगने लगी है। दूसरी तरफ हिंसा, झड़पें और पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें भी सामने आ रही हैं। अगर आंदोलन का उद्देश्य छात्रों को न्याय दिलाना था, तो फिर यह रास्ता कहाँ बदल गया?
मैं जवाबदेही के पक्ष में हूँ। मैं शांतिपूर्ण विरोध के पक्ष में हूँ। लेकिन मैं किसी भी ऐसे मोड़ के पक्ष में नहीं हूँ जहाँ छात्रों की आवाज़ राजनीतिक एजेंडा बन जाए।
Gen Z से कुछ सवाल…
- क्या आपने पूरा मुद्दा समझकर अपनी राय बनाई है?
- जो स्टेटस, रील या पोस्ट आप शेयर कर रहे हैं, क्या आपने उसकी सच्चाई जाँची?
- क्या हम छात्रों की लड़ाई लड़ रहे हैं, या किसी राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन रहे हैं?
- अगर कल यही मुद्दा हल हो जाए, तो क्या मंच पर मौजूद सभी लोग छात्रों के साथ खड़े रहेंगे?
मैं यह नहीं कह रहा कि हर नेता गलत है। मैं सिर्फ इतना पूछ रहा हूँ कि क्या छात्रों का मुद्दा कहीं पीछे तो नहीं छूट गया?
और एक बात…
अगर किसी छात्र को दोबारा परीक्षा देने का अवसर मिला था और वह अपनी मेहनत के दम पर फिर से सफल हो सकता था, तो हमें उस पहलू पर भी बात करनी चाहिए। समाधान केवल गुस्से में नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने में है।
मेरे लिए यह आंदोलन राजनीति का नहीं, शिक्षा व्यवस्था में सुधार का विषय है।












