वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा बुधवार, 2 सितंबर 2026 को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सभागार में सुप्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति के चर्चित उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ के लोकार्पण-सह-परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं विश्वविद्यालय के कुलगीत के गायन के साथ हुआ। इसके पश्चात मंचस्थ अतिथियों का स्वागत तस्वीर, उत्तरीय, गुलाब का पुष्प एवं पौधा भेंट कर किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी विभाग की अध्यक्ष प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि शिवमूर्ति के पात्र संकटों का शिकार होने के बावजूद संघर्ष करते हुए जीवित रहने का माद्दा रखते हैं। उन्होंने उपन्यास के आवरण की प्रतीकात्मकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा पूरा आवरण किसान संस्कृति के विडंबनापूर्ण यथार्थ को सामने लाता है।प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि उपन्यास में स्त्री पात्र अत्यंत मजबूत और संघर्षशील हैं। इसकी कथा केवल बनकट गाँव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर भारत के ग्रामीण जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा कि इस कथा का नायक कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा बनकट गाँव है।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ कवि एवं आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि शिवमूर्ति ने ग्रामीण जीवन के सघन अंतर्लोक को अत्यंत बारीकी से बुना है। बादल की गड़गड़ाहट से शुरू होकर नगाड़े की धुन पर समाप्त होने वाला यह उपन्यास ‘भय से भरोसे की यात्रा’ है। उन्होंने इसे पुरातात्त्विक और समाजशास्त्रीय महत्त्व का उपन्यास बताते हुए कहा कि इसके कई केंद्रीय सूत्र हैं। नसबंदी, चकबंदी और नाकेबंदी इसके प्रमुख केंद्रबिंदु हैं। उपन्यास के पात्र बीज, बिजली और बाज़ार के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि यह कृति सुने हुए को देखे गए से और देखे गए को भोगे हुए से जोड़ती है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग के प्रो. कुमार वीरेन्द्र ने कहा कि उपन्यास में चौतरफा घेरेबंदी का परिवेश निर्मित हुआ है। शिवमूर्ति को इसे लिखने में लगभग पाँच वर्ष लगे और इसमें आपातकाल से लेकर मायावती के मुख्यमंत्री बनने तक का सामाजिक-राजनीतिक परिवेश दर्ज हुआ है। उन्होंने कहा कि शिवमूर्ति ने कचहरी की व्यवस्था की जिस प्रभावशाली ढंग से आलोचना की है, उसका संबंध उनके अपने जीवनानुभवों से भी जुड़ता है।
उन्होंने उपन्यास में पात्रों के रोचक नामकरण, गाँव की स्वाभाविक दुश्मनी, ग्रामीण संवेदनाओं के प्रामाणिक चित्रण तथा सामाजिक सौमनस्य की आकांक्षा को इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताया।
इस अवसर पर उपन्यासकार शिवमूर्ति ने अपने लेखकीय वक्तव्य में अपनी रचनात्मक यात्रा के स्रोतों को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रेमचंद की कहानियाँ उनके जीवन में एक मोड़ बनकर आईं और यहीं से उन्हें कहानी लेखन की प्रेरणा मिली। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद और रेणु उनके लिए गुरु की तरह हैं। उन्होंने रेणु से कथा-शिल्प और प्रेमचंद की रचनाओं में मौजूद विविध संवेदनाओं को आधार बनाकर अपनी लेखकीय यात्रा को आगे बढ़ाया और इसी यात्रा का परिणाम ‘अगम बहै दरियाव’ है। उन्होंने यह भी बताया कि वे फिलहाल एक और उपन्यास पर काम कर रहे हैं।
आसनसोल से आए युवा आलोचक डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ने उपन्यास में उपस्थित प्रेम-संबंधों पर चर्चा करते हुए कहा कि सूरे-छब्बी, झनाका-दलसिंगार, भगवत पांडेय-अनारो तथा बोधा-दिलजानी के संबंध त्रासद प्रेम के उदाहरण हैं। उन्होंने शिवमूर्ति की लोकगीतों पर गहरी पकड़ को भी रेखांकित किया।
डॉ. विन्ध्याचल यादव ने कहा कि शिवमूर्ति की रचनात्मकता का ‘महत्तम समापवर्तक’ ‘अगम बहै दरियाव’ है। इसमें उत्पीड़न, शोषण और संघर्ष के साथ अवध की किसान-मजदूर जनता के पुनः उठ खड़े होने की छवियाँ भी अंकित हैं। उन्होंने कहा कि शिवमूर्ति का कोई भी पात्र समझौता नहीं करता, बल्कि संघर्ष करता है।
स्वागत वक्तव्य देते हुए कार्यक्रम के संयोजक डॉ. महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा ने कहा कि वे पिछले डेढ़ वर्ष से शिवमूर्ति के उपन्यास पर इस कार्यक्रम के आयोजन की इच्छा रखते थे, लेकिन विभिन्न कारणों से यह संभव नहीं हो पा रहा था। उन्होंने कहा कि शिवमूर्ति हमारे समय के ऐसे कथाकार हैं, जिन्हें सभी पीढ़ियों के पाठक पसंद करते हैं।
कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. रवि शंकर सोनकर ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी दीक्षा मिश्रा ने किया। कार्यक्रम में प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. बलिराज पाण्डेय, प्रो. मनोज कुमार सिंह, प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, प्रो. कमलेश वर्मा, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. किंगसन सिंह पटेल, डॉ. प्रीति जायसवाल, डॉ. प्रभात कुमार मिश्र, डॉ. प्रियंका सोनकर, डॉ. राज कुमार मीणा, डॉ. सत्यप्रकाश सिंह, डॉ. राजीव कुमार, डॉ. अमित कुमार पाण्डेय, अंकित कुमार मौर्य, मनीष खत्री सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।



