मखाना आधारित एकीकृत बागवानी प्रणाली एक लाभकारी एवं संसाधन-कुशल मॉडल : डिन
-वर्षभर रोजगार, पोषण सुरक्षा तथा पर्यावरणीय स्थिरता का उत्कृष्ट उदाहरण है मखाना उत्पादन
माला सिन्हा
पीपराकोठी : मखाना आधारित एकीकृत बागवानी प्रणाली छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए एक अत्यंत लाभकारी तथा संसाधन-कुशल कृषि मॉडल है, जिसमें मखाना, मछली, फल एवं सब्जी उत्पादन को एक साथ जोड़कर वर्षभर आय एवं रोजगार सुनिश्चित किया जाता है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय उद्यानिकी और वानिकी महाविद्यालय ने मखाना आधारित मॉडल विकसित कर रहा है. यह मॉडल विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहाँ जल संसाधन उपलब्ध हैं तथा किसान सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना चाहते हैं. महाविद्यालय के डीन डॉ. कुंदन किशोर ने बताया कि मखाना आधारित बागवानी प्रणाली न केवल लाभदायक है बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी भी है. डॉ. किशोर ने बताया कि मखाना की बाजार क्षमता को ध्यान में रखते हुए यह प्रणाली आजीविका, साल भर आय, और टिकाऊ कृषि विकास प्राप्त करने का एक आशाजनक मार्ग प्रदान करती है एवं इच्छुक किसान यहां आकर बागवानी एवं वानिकी महाविद्यालय से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.
0.5 एकड़ क्षेत्र से 3–4 क्विंटल मखाना बीज का होगा उत्पादन : डॉ. सुधीर दास, प्राध्यापक, ने बताया कि 0.5 एकड़ क्षेत्रफल में विकसित इस मॉडल में लगभग 0.30–0.35 एकड़ क्षेत्र में तालाब रखा जाता है, जबकि शेष क्षेत्र का उपयोग मेड़ों पर फलदार पौधों एवं सब्जी उत्पादन के लिए किया जाता है. आर्थिक दृष्टि से यह मॉडल अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है. प्रथम वर्ष में लगभग 1.05 लाख की सकल आय एवं 60,000 का शुद्ध लाभ प्राप्त होने की संभावना रहती है. मखाना की खेती के लिए 0.75–1.5 मीटर गहराई वाला तालाब उपयुक्त माना जाता है. मखाना की रोपाई 1–1.5 मीटर की दूरी पर की जाती है. नियमित रूप से खरपतवार नियंत्रण, जल गुणवत्ता प्रबंधन तथा पौधों की निगरानी करने से बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है. परिपक्व फलों से बीज निकालकर उन्हें साफ, सुखाकर सुरक्षित रूप से भंडारित किया जाता है. सामान्यतः 0.5 एकड़ क्षेत्र से 3–4 क्विंटल मखाना बीज प्राप्त होते हैं, जिससे लगभग 40 से 60 हजार की आय अर्जित की जा सकती है.
मखाना उत्पादन के पश्चात उसी तालाब में होगा सिंघाड़ा व मछली उत्पादन : मखाना उत्पादन के पश्चात उसी तालाब का उपयोग मछली पालन के लिए किया जाता है जिससे 250–350 किलोग्राम तक मछली उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है, जिससे लगभग 20 से 25 हजार की अतिरिक्त आय होती है. मखाना कटाई के बाद तालाब के उपलब्ध क्षेत्र में सिंघाड़ा की खेती भी की जाती है, जिससे लगभग 20 से 30 हजार की अतिरिक्त आय अर्जित होती है. तालाब की मेड़ों का उपयोग फलदार पौधों के रोपण के लिए किया जाता है. मेड़ों पर आम, अमरूद तथा पपीता जैसे फलदार पौधे लगाए जाते हैं. फलदार पौधे न केवल किसानों की आय बढ़ाते हैं, बल्कि जैव विविधता, पर्यावरण संरक्षण एवं दीर्घकालीन आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं.
मेड़ो पर लगाये फलदार व शब्जी : तालाब की मेड़ों पर बेल वाली सब्जियों जैसे लौकी, करेला, खीरा एवं झिंगा को बांस की मचान पर उगाया जाता है, जबकि भिंडी, मिर्च एवं लोबिया जैसी फसलें खुली जगह में लगाई जाती हैं. सब्जी उत्पादन से लगभग 25 से 55 हजार तक की अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है. आर्थिक दृष्टि से यह मॉडल अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। प्रथम वर्ष में लगभग 1.05 लाख की सकल आय एवं 60 हजार का शुद्ध लाभ प्राप्त होने की संभावना रहती है. जैसे-जैसे फलदार पौधे उत्पादन में आते हैं प्रणाली स्थिर होती जाती है,
छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक प्रभावी माध्यम : आय में निरंतर वृद्धि होती है. कुल मिलाकर, 0.5 एकड़ तालाब आधारित मखाना आईएफएस मॉडल कम लागत, अधिक उत्पादन, संसाधनों के कुशल उपयोग, वर्षभर रोजगार, पोषण सुरक्षा तथा पर्यावरणीय स्थिरता का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मॉडल किसानों को एक ही इकाई से बहुआयामी उत्पादन एवं स्थायी आय प्रदान करता है तथा ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यह प्रणाली जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के प्रति भी अधिक अनुकूल है और छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक प्रभावी एवं व्यावहारिक विकल्प सिद्ध हो सकती है.












