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Thursday, June 18, 2026
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“नव वर्ष” परंपराएँ अपनी-अपनी, केक पर फूंकने से पड़ता है थूक, होता अग्नि का भी अपमान- जितेंद्र सिन्हा

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सभी देशों में अपनी-अपनी परंपराओं के साथ मनाया जाता है नववर्ष

लेखक-जितेंद्र कुमार सिन्हा, पटना में स्थानीय संपादक हैं।

नववर्ष दुनियाभर में अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्न समुदाय और प्रदेश अपनी-अपनी संस्कृति के अनुरूप इसे अलग-अलग समय और तरीके से मनाते हैं।

पटना में स्थानीय संपादक जितेंद्र कुमार सिन्हा। फ़ाइल फोटो- देश वाणी।

मोमबत्ती फूंकने की जगह, दीया जलाने की सलाह-

मोमबत्ती को फूंक कर बुझाने की जगह दीया जलाते हुए ताली बजाकर “हैपी न्यू इयर बोलने” की सलाह दे रहे सनातन संस्कृति के जानकार।

दुनिया में नववर्ष का इतिहास और परंपराएं

दुनिया के अधिकतर देश 1 जनवरी को नववर्ष मनाते हैं। यह परंपरा 45 ईसा पूर्व रोमन सम्राट जूलियस सीजर द्वारा शुरू की गई थी। उन्होंने खगोलविदों की मदद से यह तय किया कि पृथ्वी को सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं, और इसी आधार पर जूलियन कैलेंडर तैयार किया गया।

इसके बाद ग्रेगोरियन कैलेंडर का प्रचलन हुआ, जिसे सबसे पहले 1582 में इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने अपनाया। भारत ने इसे 1752 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान स्वीकार किया।

वाराणसी से छपने वाला ठाकुर प्रसाद का पंचांग। फोटो- देश वाणी।

भारत में नववर्ष का विविध स्वरूप

भारत में नववर्ष अलग-अलग कैलेंडर और परंपराओं पर आधारित है:

  • चैत्र शुक्ल प्रतिपदा: इसे हिन्दू नववर्ष माना जाता है, जब भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी।
  • गुड़ी पड़वा: महाराष्ट्र में नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।
  • उगाड़ी: आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में मनाया जाने वाला तेलुगू नववर्ष।
  • बैसाखी: पंजाबी नववर्ष, जिसे खेती से भी जोड़ा जाता है।
  • बोहाग बिहू: असमिया नववर्ष।
  • पुथंडु: तमिल नववर्ष।

हर राज्य और समुदाय अपनी-अपनी सांस्कृतिक धरोहर के अनुसार नववर्ष का स्वागत करता है।

कैलेंडर नववर्ष और आधुनिक परंपराएं

1 जनवरी को कैलेंडर नववर्ष के रूप में दुनियाभर में मनाया जाता है। लोग 31 दिसंबर की रात को रोशनी, आतिशबाजी, और पार्टी के माध्यम से नए साल का स्वागत करते हैं। हालांकि, यह परंपरा भारतीय सनातन संस्कृति से मेल नहीं खाती।

सनातन संस्कृति में अग्नि की होती है पूजा-

देखा जाय तो अब हर धर्म के लोग, जन्म दिन हो या कोई अन्य उत्सव, केक जरूर काटते हैं और केक कैसे काटते हैं!  पहले केक पर मोमबत्ती लगाते है, फिर उसे जलाते हैं, फिर उस मोमबत्ती को खुद फूंक कर बुझा देते हैं और तब केक काटते है। 

दीया बुझाने को माना जाता अपसगुन- 

जबकि यह संस्कृति, सनातन संस्कृति के बिल्कुल विपरीत है। क्योंकि सनातन संस्कृति में यदि दीपक जलाया जाए और यदि वह दीपक बुझ जाए, तो इसे अपसगुन माना जाता है और किसी अनजानी अनहोनी होने की ओर इशारा समझा जाता है।  

लेकिन आज सनातन समाज, अब दीपक जलाने में नहीं, बल्कि उसे बुझाने में अपनी खुशी का पर्याय मानने लगा है। 

भोजपुरी भाषा में “उनकर दीया बुझा गइल” मतलब उनकी संतान हानि या वे खुद अब नहीं रहे समझा जाता है।

फूंकने से पड़ता है केक पर थूक-

 परंपरा से जुड़े लोग, यहाँ तक कि निरक्षर लोग भी अग्नि को मुँह से फूंक कर नहीं बुझाते। लेकिन अपने को एडवांस दिखाने के लिए वेस्टर्न कल्चर के नकलची बन गये है। नतीजतन कुछ लोग फूंक कर दीया बुझाने लगे हैं।

विज्ञान के अनुसार साबित हुआ है कि मुँह से फूंकने पर थूक भी केक पर पड़ता है। जिससे अब समझदार लोग जन्मदिन, सालगिरह या न्यू इयर का केक खाने से परहेज़ कर रहे हैं।

सनातन संस्कृति का दृष्टिकोण

सनातन संस्कृति में नववर्ष का आरंभ प्रकाश और सकारात्मकता से होता है। दीपक जलाना शुभ माना जाता है, जबकि आधुनिक नववर्ष में अंधकार करके और केक काटकर उत्सव मनाने की परंपरा विकसित हुई है।

भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता

भारतीय संस्कृति में शाकाहार, गौ सेवा, और बुजुर्गों का सम्मान महत्वपूर्ण है। आधुनिकता के बावजूद इन परंपराओं को सहेजने की आवश्यकता है। हमें संकल्प लेना होगा कि भारतीय परंपराओं और मूल्यों को अपनाते हुए अपनी संस्कृति का संरक्षण करेंगे।

भारतीय संस्कृति केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा है।

 

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