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नरसंडा ग्राम में छठ के बाद हुआ मां लक्ष्मी की प्रतिमा का विसर्जन

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जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 30 अक्तूबर ::

पटना जिला के नरसंडा ग्राम में दीपावली एव छठ पर्व की भव्य धार्मिक गतिविधियों का समापन मंगलवार को मां लक्ष्मी समेत अन्य देव प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ हुआ।

दिलचस्प बात यह रही कि छठ पूजा समाप्त होने के बाद भी शहर एव आसपास के कई मुहल्लों में मां लक्ष्मी की प्रतिमाएं स्थापित रहीं और श्रद्धालु लगातार आराधना में जुटे रहे। इसी क्रम में नरसंडा ग्राम की कायस्थ परिवार द्वारा अपने निजी पारिवारिक मंदिर में परंपरा के अनुसार दिवाली के दिन श्री गणेश, मां महालक्ष्मी, मां महापार्वती, मां महासरस्वती एव श्री कार्तिकेय स्वामी की प्रतिमाओं का विशेष पूजन किया गया था।

ग्रामवासियों के अनुसार इस अनूठी परंपरा के तहत प्रतिमाओं का विसर्जन छठ पूजा के परण के बाद वाले दिन किया जाता है और उसके अगले दिन भंडारा आयोजित कर प्रसाद वितरण किया जाता है। पूरे गांव में हर वर्ष केवल एक ही प्रतिमा स्थापना होती है, और यह परंपरा वर्षों से ग्राम की आस्था एव एकजुटता का प्रतीक बनी हुई है। पूरा नरसंडा गांव इस पूजन कार्यक्रम का उत्साहपूर्वक हिस्सा बनता है और देवी-देवताओं की आराधना पूरे मनोयोग से करता है।

मंगलवार को प्रतिमा विसर्जन के दौरान गांव में श्रद्धा एव उत्साह का मनभावन संगम दिखाई दिया। पूजा समिति के युवाओं ने भक्ति गीतों की धुन पर झूमते हुए प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकाली। श्रद्धालुओं की टोली मोहानी तालाब तक पहुँची, जहाँ विधि-विधान के साथ विसर्जन किया गया। वहां उपस्थित लोगों ने अपने परिवार, गांव एव समाज की खुशहाली की कामना के साथ पूजा-अर्चना की।

पूजा समिति की अध्यक्ष अर्पणा बाला ने बताया कि हर वर्ष छठ समाप्ति के अगले दिन प्रतिमा विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें पूरे मुहल्ले के लोग बढ़-चढ़कर शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। इस मौके पर सचिव शाकंभरी, कोषाध्यक्ष शिवम जी सहाय, अंशुमली, सुंदरम सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे। ग्राम के बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक, सभी ने पूरे उत्साह से कार्यक्रम में भाग लिया।

भंडारा आयोजन के दौरान सादगी और भक्ति का सुंदर मेल देखने को मिला। छठ जैसे महान लोकपर्व के बाद यह सामूहिक आयोजन गांव में खुशियों को और गहरा करता है, मानो गांव का हर घर रोशनी और भक्ति की नदी में नहाया हो। मंदिर प्रांगण में भक्तों की भीड़, घंटियों की ध्वनि और प्रसाद का स्वाद, हर किसी को साल भर याद रह जाने वाला आध्यात्मिक अनुभव दे गया।

नरसंडा ग्राम की यह सामूहिक परंपरा सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द, सामूहिक संस्कृति और विरासत को संजोने की मिसाल है, जो अगली पीढ़ियों तक प्रेरणा बनकर पहुँचेगी।
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