जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 30 मार्च, 2025
पटना। चैत्र नवरात्र इस बार आठ दिनों का है, जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र के पहले तीन दिन देवी शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी और चंद्रघंटा की आराधना होती है। इस क्रम में, दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। इस वर्ष सोमवार को चैत्र नवरात्रा का दूसरा दिन है।
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और भव्य है। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। नवरात्र के इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है।

मां ब्रह्मचारिणी की कथा
मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी ने अपने पूर्व जन्म में राजा हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने देवर्षि नारद के उपदेश पर भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की।
- उन्होंने एक हजार वर्षों तक केवल फल-मूल ग्रहण किया।
- सौ वर्षों तक सिर्फ शाक पर निर्वाह किया।
- खुले आकाश के नीचे रहकर वर्षा और धूप के कष्ट सहे।
- कठोर तपस्या के कारण उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया।
मां की इस अवस्था को देखकर उनकी माता मैना अत्यंत दुखी हुईं और उन्हें पुकारते हुए “उ…मां…” कहा, जिससे उनका एक नाम “उमा” भी प्रसिद्ध हुआ। उनकी तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया, और देवता, ऋषि, मुनि उनकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्माजी ने आकाशवाणी करके कहा—
“हे देवी! आज तक किसी ने इतनी कठोर तपस्या नहीं की। तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी, और भगवान शिव तुम्हारे पति बनेंगे। अब घर लौट जाओ।”
बाद में मां पार्वती का विवाह भगवान शिव से हुआ।
पूजा विधि और भोग
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में सफेद और सुगंधित फूल, अक्षत, कुमकुम और सिंदूर अर्पित किए जाते हैं। पंचामृत से स्नान कराकर पूजा की जाती है।
मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
दधाना कर पद्माभ्यां अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
मां को शक्कर और शक्कर से बनी चीजों का भोग लगाया जाता है, विशेष रूप से खीर और साबूदाना खीर का।
नवरात्र में उपवास
- केवल गंगाजल और दूध का सेवन श्रेष्ठ माना जाता है।
- फलाहार करना उत्तम है।
- यदि फलाहार संभव न हो तो एक समय अरवा चावल, सेंधा नमक, चने की दाल और घी से बनी सब्जी ग्रहण की जा सकती है।