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भगवान चित्रगुप्त : कर्मों के अदृश्य लेखा-जोखा के दिव्य संरक्षक

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जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 21 अक्तूबर :



कर्म का सनातन सिद्धांत और चित्रगुप्त का न्यायिक स्थान-

सनातन धर्म में कर्म को सृष्टि का शाश्वत नियम माना गया है। हर जीव जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है। इस महान न्यायिक व्यवस्था के संचालक हैं भगवान चित्रगुप्त, जिन्हें सृष्टि का मूल्यांकनकर्ता कहा गया है। वे स्वर्गलोक में धर्मराज यम के सहयोगी के रूप में सभी प्राणियों के कर्मों का सूक्ष्म लेखा रखते हैं।

लेखक -जितेन्द्र कुमार सिन्हा, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के पूर्व पदाधिकारी हैं। फाइल फोटो- देशवाणी

कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को पूरे भारतवर्ष में भगवान चित्रगुप्त की पूजा “चित्रगुप्त पूजा” या “कायस्थ द्वितीया” के रूप में मनायी जाती है।


ब्रह्मा की तपस्या से हुआ प्राकट्य-

जब धर्मराज यम ने ब्रह्मा से कर्मों का लेखा रखने वाला सहयोगी मांगा, तब ब्रह्मा ने सहस्र वर्षों की तपस्या की। उनकी काया से तेजोमय पुरुष के रूप में भगवान चित्रगुप्त प्रकट हुए। ब्रह्मा ने उन्हें आदेश दिया — “हे चित्रगुप्त, तुम सृष्टि के प्रत्येक जीव के कर्मों का लेखा रखो, उसके अनुसार न्याय करो और धर्म की स्थापना करो।”
इसी से उन्हें यमलोक के सचिव और सृष्टि के कर्म-मूल्यांकनकर्ता का पद प्राप्त हुआ।


चित्रगुप्त का अर्थ और स्वरूप-

“चित्र” का अर्थ है स्पष्ट, और “गुप्त” का अर्थ है अंतर्गोपित — अर्थात वे जो सबकुछ जानते हैं, पर गुप्त रूप से न्याय करते हैं।
उनका स्वरूप तेजस्वी है, वे कमलासन पर विराजमान रहते हैं, हाथों में कलम, दवात और कर्मों की पुस्तक धारण किए रहते हैं। कंधे पर उनकी करवाल न्याय का प्रतीक है।


कायस्थ कुल की उत्पत्ति और पूजा परंपरा-

भगवान चित्रगुप्त की दो पत्नियाँ — देवी शोभावती और देवी नंदिनी — मानी जाती हैं। उनसे बारह पुत्र हुए, जिनसे बारह कायस्थ गोत्रों का जन्म माना गया। यही गोत्र आज कायस्थ समाज के रूप में पूजे जाते हैं।

दीवाली के दूसरे दिन कायस्थ समाज में विशेष रूप से कलम, दवात, बहीखातों तथा आधुनिक युग में कंप्यूटर और लैपटॉप तक का पूजन किया जाता है। इससे ज्ञान और कर्म दोनों की पवित्रता का संदेश मिलता है।


पौराणिक कथा: राजा सौदास का मोक्ष

कथा के अनुसार, सौराष्ट्र का राजा सौदास अधर्मी था, परंतु उसने कार्तिक द्वितीया के दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा की थी। मृत्यु के पश्चात जब यमदूत उसे यमलोक ले गए, तो चित्रगुप्त ने कहा — “इसने हमारे पर्व पर पूजा की थी, अतः इसके पाप क्षमा कर दिए जाएं।”
इस कथा से चित्रगुप्त पूजा की मोक्षदायी महिमा प्रकट होती है।


महत्वपूर्ण तीर्थस्थल: उज्जैन, अयोध्या और कांचीपुरम-

  • उज्जैन (मध्य प्रदेश): यहाँ अंकपात क्षेत्र में भगवान चित्रगुप्त का अवतरण हुआ माना जाता है। क्षिप्रा तट पर स्थित ‘चित्रगुप्त शिला मंदिर’ में प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।
  • अयोध्या: सरयू नदी के दक्षिण तट पर स्थित श्री धर्म-हरि चित्रगुप्त मंदिर वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु ने यमराज और चित्रगुप्त की संयुक्त पूजा परंपरा प्रारंभ की थी।
  • कांचीपुरम (तमिलनाडु): यहाँ का श्री चित्रगुप्त स्वामी मंदिर दक्षिण भारत का प्रमुख तीर्थ है। यह संगमरमर की प्रतिमा वाला दुर्लभ मंदिर है, जहाँ प्रतिवर्ष कार्तिक द्वितीया को भव्य महोत्सव आयोजित होता है।

कर्म, धर्म और न्याय का प्रतीक-

गरुड़ पुराण, पद्म पुराण और विष्णु धर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि “चित्रगुप्त सर्वज्ञ देव हैं, जो सभी लोकों के कर्मों के साक्षी हैं।”
उनकी लेखनी निष्पक्ष, अचूक और धर्मनिष्ठ है। देवता भी उनके निर्णयों से परे नहीं जा सकते।

आज के सूचना युग में चित्रगुप्त का संदेश और भी प्रासंगिक है — कि हर कार्य, हर निर्णय का परिणाम निश्चित है। सत्य, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।


चित्रगुप्त पूजा: आत्ममंथन और सद्कर्म का संकल्प-

यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है — अपने कर्मों की समीक्षा और सद्मार्ग पर चलने का व्रत। भगवान चित्रगुप्त हमें स्मरण कराते हैं कि कुछ भी छिपा नहीं रहता; हर कर्म का फल अवश्य है।

उनका शाश्वत संदेश यही है — “कर्म करो, पर धर्म के अनुरूप करो।”


Lord Chitragupta Divine Guardian of the Invisible Record of Deeds/Actions.

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