Motihari | माला सिन्हा|
पीपराकोठी : बिहार सहित पूरे देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने में उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में विशेषकर यूरिया के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग ने खेती की लागत बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है. उक्त जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख सह वरीय वैज्ञानिक डा अरविन्द कुमार सिंह ने दी. आगे उन्होंने बताया कि इसी को ध्यान में रखते हुए देशभर में संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. संतुलित उर्वरक उपयोग का अर्थ है फसल की आवश्यकता और मृदा परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का उचित मात्रा में प्रयोग करना. केवल अधिक उर्वरक डालने से उत्पादन नहीं बढ़ता, बल्कि इससे पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा होता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता धीरे-धीरे घटने लगती है. बिहार के कई क्षेत्रों में जिंक, सल्फर और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी इसी असंतुलित उर्वरक उपयोग का परिणाम है. वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के कारण उर्वरकों की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बना हुआ है. भारत अपनी उर्वरक आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसके लिए देश को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है. ऐसे में उर्वरकों का विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग न केवल किसानों के लिए बल्कि राष्ट्रीय हित में भी आवश्यक है. किसान मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसाओं का पालन करें, जैविक खादों और जैव उर्वरकों का उपयोग बढ़ाएँ तथा नाइट्रोजन उर्वरकों का विभाजित प्रयोग करें. इससे उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ती है, लागत घटती है और फसल उत्पादन अधिक टिकाऊ बनता है. संतुलित उर्वरक उपयोग से उत्पादन लागत कम होती है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, पर्यावरण संरक्षण होता है तथा उर्वरक आयात पर निर्भरता भी घटती है. इसलिए आज आवश्यकता है कि किसान “जितनी जरूरत, उतना उर्वरक” के सिद्धांत को अपनाएँ और वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार पोषक तत्व प्रबंधन करें. संतुलित उर्वरक उपयोग केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि किसानों की समृद्धि, मिट्टी की सेहत और देश की कृषि आत्मनिर्भरता का आधार है.












