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स्वाति नक्षत्र की बारिश और लोक जीवन, चक्रवातों के दौर में बुजुर्गों की याद और पारंपरिक ज्ञान

-बंगाल की खाड़ी के चक्रवात बनाम पीढ़ियों पुराना स्वाति ‘नक्षत्र’

-स्वाति की बूंदों का जादू, कपूर से लेकर मोती और पपीहे की प्यास तक

देश वाणी। दिलीप दुबे

मोतिहारी। बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवाती तूफान के कारण इन दिनों हो रही बारिश ने एक बार फिर पारंपरिक लोक-जीवन और आधुनिक मौसम विज्ञान की बहस को जीवित कर दिया है। आज भले ही मौसम की जानकारी के लिए ‘चक्रवात’ और ‘अर्णव’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल होने लगा हो, लेकिन ग्रामीण समाज की जड़ें आज भी नक्षत्रों और बुजुर्गों के अनुभवों से जुड़ी हैं। बुजुर्गों की यादों को ताजा करें तो पहले मौसम का मिजाज नक्षत्रों से तय होता था, जैसे हथिया, उतरा, चित्रा और स्वाति जैसी नक्षत्रों की वर्षा ही फसल और जीवन का आधार हुआ करती थी।

खेती और स्वाति नक्षत्र का समीकरण

लोक-कथाओं और किसानों के पारंपरिक ज्ञान में स्वाति नक्षत्र को लेकर कई तरह की मान्यताएं और कहावतें प्रचलित हैं। एक पुरानी कहावत के अनुसार, “सात सेवाती फूटे धान, चौदह पइया एक्के धान”। इसका अर्थ यह है कि यदि स्वाति नक्षत्र के दौरान धान की बालियां फूट जाएं, तो उनमें दाना पड़ने की संभावना कम हो जाती है और धान की फसल खड़ी (बिना दाने की) रह जाती है। ऐसे में किसान पीढ़ियों से इन नक्षत्रों के हिसाब से अपनी खेती की चिंता और उम्मीदें जोड़े रखते आए हैं।

लोक कथाओं में स्वाति की बूंदों का महत्व

स्वाति नक्षत्र की बारिश को लेकर लोक समाज में अनगिनत लोक-कथाएं और मान्यताएं सदियों से चली आ रही हैं। ऐसी ही एक कथा कपूर और मोती की है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्वाति नक्षत्र में गिरने वाली बारिश की बूंद जब केले के पौधे पर पड़ती है, तो उसकी जड़ में कपूर का निर्माण होता है। वहीं, समुद्र में सीप के खुले मुंह में यह बूंद गिरने पर वह बहुमूल्य मोती बन जाती है।

वहीं दूसरी कथा पपीहे की निष्ठा का है। पपीहा पक्षी को लेकर लोक में प्रेम और प्यास की अनूठी मिसाल दी जाती है। कहा जाता है कि पपीहा अपनी वर्षभर की प्यास बुझाने के लिए केवल स्वाति नक्षत्र की पहली बूंद का ही इंतजार करता है। बुजुर्गों के अनुसार, सच्चा प्रेम पपीहे की तरह होना चाहिए, जो चाहे प्राण त्याग दे, लेकिन किसी तालाब या पोखर का गंदा पानी पीने के बजाय केवल स्वाति की बूंद का ही पान करे।

आज भले ही आधुनिक तकनीक ने मौसम की परिभाषा बदल दी हो, लेकिन स्वाति नक्षत्र और उससे जुड़ी ये लोक-कहानियां आज भी हमारे ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक धरोहर का एक अहम हिस्सा बनी हुई हैं।

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