Homeबिहारमोतिहारीबीमारी से नहीं बल्कि अपर्याप्त परागण घटाता है परवल की पैदावार: डॉ....

बीमारी से नहीं बल्कि अपर्याप्त परागण घटाता है परवल की पैदावार: डॉ. राम बाबू

-

 -परवल के खेतों में नर एवं मादा पौधों का उचित अनुपात बनाए रखना जरूरी 

माला सिन्हा 

पीपराकोठी : परवल बिहार की प्रमुख एवं आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सब्जी फसलों में से एक है. हमारा राज्य देश में परवल उत्पादन करने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल है. वर्तमान में बिहार में लगभग 11,000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में परवल की खेती की जाती है, जिससे प्रतिवर्ष लगभग 1.13 लाख मीट्रिक टन उत्पादन प्राप्त होता है. यह फसल किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है. परवल एक बहुवर्षीय फसल है, जिसमें एक बार रोपाई करने के बाद लगभग मार्च से अक्टूबर तक 7–8 महीनों तक लगातार फल प्राप्त होते हैं. यही कारण है कि यह जिले के किसानों की आय का एक प्रमुख स्रोत भी है. हालाँकि, कई बार किसानों को एक ऐसी समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसे वे अक्सर रोग, कीट या पोषक तत्वों की कमी से जोड़कर देखते हैं. प्रायः देखा जाता है कि परवल की लतरों पर मादा फूलों की संख्या पर्याप्त होती है और उनसे छोटे-छोटे फल भी बनने लगते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद ये फल पीले पड़कर गिर जाते हैं. ऐसी स्थिति में किसान विभिन्न दवाइयों का छिड़काव करते हैं तथा अतिरिक्त उर्वरकों का प्रयोग करते हैं, फिर भी अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता. वास्तव में अधिकांश मामलों में इस समस्या का मुख्य कारण कोई रोग या पोषण संबंधी कमी नहीं, बल्कि उचित परागण का अभाव होता है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय  ने इन समस्याओं के समाधान के लिए हाथ से परागण कर परवल का उत्पादन बढ़ाया गया. डॉ. राम बाबू शर्मा, सह प्राध्यापक के अनुसर, परवल  में  नर एवं मादा फूल अलग-अलग पौधों पर पाए जाते हैं. मादा फूल के नीचे प्रारंभिक अवस्था से ही छोटा फल दिखाई देता है, लेकिन फल का समुचित विकास तभी संभव है जब नर फूलों के परागकण मादा फूल तक पहुँचकर निषेचन की प्रक्रिया पूरी करें. यदि परागण नहीं हो पाता या पर्याप्त मात्रा में परागकण मादा फूल तक नहीं पहुँचते, तो निषेचन अधूरा रह जाता है. परिणामस्वरूप प्रारंभिक अवस्था में विकसित हो रहा फल कुछ दिनों बाद पीला पड़ जाता है और अंततः गिर जाता है. इस समस्या से बचने के लिए खेत में नर एवं मादा पौधों का उचित अनुपात बनाए रखना चाहिए. सामान्यतः लगभग 10 मादा पौधों पर 1 नर पौधा अवश्य होना चाहिए, ताकि पर्याप्त मात्रा में पराग उपलब्ध हो सके. कई बार किसान अनजाने में नर पौधों की संख्या बहुत कम रखते हैं, जिससे परागण प्रभावित होता है और फल झड़ने की समस्या बढ़ जाती है. परागणकारी कीट परवल में सफल परागण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. इसलिए फूल आने के समय अनावश्यक कीटनाशकों के प्रयोग से बचना चाहिए, जिससे इन लाभकारी कीटों का संरक्षण हो सके. यदि प्राकृतिक परागण पर्याप्त न हो, तो सुबह के समय नर फूल से पराग लेकर मादा फूल पर हाथ से परागण (हैंड पोलिनेशन) भी किया जा सकता है. यह एक सरल एवं प्रभावी उपाय है, जिससे फल बनने की संभावना काफी बढ़ जाती है. यदि परवल के पौधों में छोटे फल पीले होकर गिर रहे हैं, तो रोग, कीट या पोषण की समस्या न समझें सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि खेत में पर्याप्त नर पौधे मौजूद हैं तथा परागण सही ढंग से हो रहा है. सफल परागण ही अधिक फलधारण, बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ की कुंजी है.

Related articles

Bihar

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest posts