HomeBIHARमोतिहारीपरवल उत्पादकों के लिए चुनौती बना फल-लत्तर सड़न रोग

परवल उत्पादकों के लिए चुनौती बना फल-लत्तर सड़न रोग

माला सिन्हा 

पीपराकोठी : परवल एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है. जिले के संग्रामपुर, तुरकौलिया, हरसिद्धि, मधुबन, चकिया, चिरैया आदि प्रखंडों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, जो किसानों की आजीविका का एक प्रमुख साधन है. वर्तमान समय में परवल की फसल में फल एवं लत्तर सड़न रोग का बढ़ता प्रकोप किसानों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. संग्रामपुर प्रखंड के किसान ने बताया कि परवल की फसल में रोग लगने के बाद कई फल सड़कर गिर रहे हैं तथा लताओं के प्रभावित होने से उत्पादन में लगभग 25–30 प्रतिशत तक कमी आई है. किसानों की सूचना पर डॉ. आर. बी. शर्मा, सहायक प्रोफेसर, ने रविवार, 27 सितंबर 2026, को प्रभावित गांवों का दौरा कर परवल के खेतों का निरीक्षण किया. उन्होंने किसानों से बातचीत कर रोग के लक्षणों, प्रकोप की स्थिति तथा फसल को हो रहे नुकसान की जानकारी ली. निरीक्षण के दौरान यह देखा गया कि रोग के प्रमुख लक्षण सबसे पहले मिटटी से सटे फलों पर दिखाई देते है इसमें फले के ऊपर धूसर-हरे एवं पानी से भीगे हुए धब्बों बनते है. बाद में प्रभावित भाग सिकुड़ कर मुलायम होने लगता है और अधिक नमी की स्थिति में उस पर सफेद रुई जैसी फफूंद दिखाई देने लगती है. गंभीर स्थिति में पूरा फल सड़कर गिर जाता है. इसी प्रकार, लत्तर की गांठों अथवा दो गांठों के बीच का हिस्सा पहले काला पड़कर बाद में नरम एवं सड़ने लगता है, जिससे आगे की लत्तर सूख जाती है. रोग का प्रकोप अधिक होने पर पूरा पौधा भी नष्ट हो सकता है. परवल में फल एवं लत्तर सड़न रोग मुख्यतः फुसरियम तथा फयतोफिथोरा जैसे रोगजनक फफूंदों से संबंधित है. अधिक नमी, जलभराव एवं गर्म मौसम रोग के विकास के लिए अनुकूल होता हैं. जमीन पर फैली लताओं तथा मिट्टी के सीधे संपर्क में आने वाले फलों में रोग का प्रकोप अधिक होता है. एकीकृत रोग प्रबंधन पर जानकारी देते हुए डॉ. शर्मा ने बताया कि रोगग्रस्त फलों एवं लताओं को खेत से निकालकर नष्ट करने, नई रोपाई के लिए केवल स्वस्थ एवं रोगमुक्त लत्तर का उपयोग करने तथा ट्रेलिस (मचान) प्रणाली अपनाने की सलाह दी गई. साथ ही, खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था रखने पर जोर दिया गया. रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देने पर मेटालैक्सिल 4 प्रतिशत, मैंकोजेब 64 प्रतिशत 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव तथा आवश्यकता पड़ने पर 10-12 दिन बाद पुनः छिड़काव करने की सलाह दी गई. इस प्रकार समेकित रोग प्रबंधन उपायों को अपनाकर परवल में फल एवं लत्तर सड़न रोग के प्रकोप एवं उससे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है. इस संबंध में पंडित दीनदयाल उपाध्याय उद्यान एवं वानिकी महाविद्यालय, पिपराकोठी के डीन डॉ. कुंदन किशोर ने कहा कि किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए महाविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा लगातार खेतों का निरीक्षण कर तकनीकी सलाह दी जा रही है. उन्होंने कहा कि रोग की समय पर पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन से फसल को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है.

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