देश वाणी। दिलीप दुबे
मोतिहारी। दीपावली के पावन पर्व पर ग्रामीण क्षेत्रों में लोक संस्कृति और प्राचीन परंपराओं का अनूठा रूप देखने को मिलता है। इसी संस्कृति का एक अहम हिस्सा ‘दरिद्र खेदने’ (दरिद्रता भगाने) की परंपरा है, जिसे ग्रामीण इलाकों में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाया जाता है।
इस परंपरा के तहत दीपावली की रात्रि में या गोवर्धन पूजा के अवसर पर घर की महिलाएं पारंपरिक तरीके से इस रस्म को पूरा करती हैं। इस अनुष्ठान के दौरान बाँस से बने पुराने सूप में कचरा, पुराना अन्न या विशेष वस्तुएं रखकर डंडे से आवाज करते हुए घर के भीतर से मुख्य द्वार तक जाया जाता है। ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार, सूप बजाने और घर के कोने-कोने से कचरे को बाहर फेंकने का यह सांकेतिक विधान घर से आलस्य, कंगाली और नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर लक्ष्मी के स्थायी वास का आह्वान करने का प्रतीक है।
आज भी आधुनिकता के इस दौर में बिहार और उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में यह लोक-अनुष्ठान हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए है, जो स्वच्छता, सकारात्मकता और उल्लास का संदेश देता है।



