Saturday, February 21, 2026
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भारत में कितने तरह के कुंभ? जानिए सनातन संस्कृति का “Search” जिस पर पश्चिम के आधुनिक वैज्ञानिक अब “Research” कर रहें।

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महाकुंभ 13 जनवरी से शुरू है और 26 फरवरी तक चलेगा

पटना में स्थानीय संपादक जितेन्द्र कुमार सिंन्हा।

महाकुंभ का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व: परंपरा, ज्योतिष और खगोल विज्ञान का संगम है। भारत विद्वानों व ऋषियों हजारों वर्षों से यह पता था-

बृहस्पति ग्रह 12 वर्षों में सूर्य का एक चक्र पूरा करता है। जब बृहस्पति और सूर्य कुंभ राशि में होते हैं, और चंद्रमा भी इससे मेल खाता है, तब कुंभ का विशेष संयोग बनता है। आधुनिक वैज्ञानिक अब इस खगोलीय घटना को “Research” के रूप में दोबारा प्रमाणित कर रहे हैं। इसीलिए पूर्ण कुंभ का आयोजन 12 वर्षों में होता है।

लेखक जितेन्द्र कुमार सिन्हा पटना में स्थानीय संपादक हैं।फाइल फोटो- देश वाणी

भारत में तीन प्रकार के कुंभ मेलों का आयोजन होता है:

अर्ध कुंभ (6 वर्ष में), पूर्ण कुंभ (12 वर्ष में), और महाकुंभ (144 वर्षों में)। इस बार उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ मेला 13 जनवरी से शुरू हुआ है और 26 फरवरी तक चलेगा।

महाकुंभ का वैज्ञानिक और ज्योतिषीय आधार:
सनातन संस्कृति में कुंभ का आयोजन खगोलीय घटनाओं और ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है। हजारों साल पहले भारतीय ऋषियों ने यह खोज की थी कि बृहस्पति ग्रह 12 वर्षों में सूर्य का एक चक्र पूरा करता है। जब बृहस्पति और सूर्य कुंभ राशि में होते हैं, और चंद्रमा भी इससे मेल खाता है, तब कुंभ का विशेष संयोग बनता है। आधुनिक वैज्ञानिक अब इस खगोलीय घटना को “Research” के रूप में दोबारा प्रमाणित कर रहे हैं।

महाकुंभ का महत्व सिर्फ आस्था से नहीं, बल्कि खगोलीय और पर्यावरणीय कारणों से भी जुड़ा है। शोध बताते हैं कि कुंभ के दौरान गंगा का पानी जीवाणुरोधी गुणों से भरपूर होता है। संगम का पानी सकारात्मक ऊर्जा और औषधीय गुण प्रदान करता है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

महाकुंभ के प्रमुख आयोजन और विशेषताएं:

  • आयोजन क्षेत्र: 4000 हेक्टेयर, 25 सेक्टर
  • 1.5 लाख टेंट और 44 घाटों की व्यवस्था
  • पार्किंग: 5.5 लाख गाड़ियों के लिए 102 स्थान
  • मुख्य स्नान: 29 जनवरी (मौनी अमावस्या), 3 फरवरी (बसंत पंचमी), 12 फरवरी (महाशिवरात्रि), 26 फरवरी (माघी पूर्णिमा)

धार्मिक मान्यता और ऐतिहासिक महत्व:
कुंभ का आयोजन समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश की कथा से जुड़ा है। हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन, और नासिक – इन चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरने के कारण यहां कुंभ का आयोजन होता है।

प्रयागराज कुंभ का उल्लेख पहली बार 1600 ईस्वी में मिलता है। सनातन धर्म के अनुसार, कुंभ मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का उत्सव है।

आध्यात्मिक अनुभव और साधु-संतों का योगदान:
महाकुंभ में 13 अखाड़ों के साधु-संत शामिल होते हैं। शाही स्नान, अखाड़ों का पारंपरिक जुलूस, मंत्रोच्चार, और हवन कुंड का धुआं वातावरण को पवित्र बनाते हैं। कुंभ में भगवा वस्त्रधारी साधुओं की उपस्थिति अद्वितीय और विहंगम दृश्य प्रस्तुत करती है।

महाकुंभ का महत्व:
कुंभ के दौरान संगम में स्नान करने से न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है, बल्कि वैज्ञानिक रूप से यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माना गया है। मान्यता है कि स्नान से पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

महाकुंभ भारतीय संस्कृति की महानता, धार्मिक परंपरा, और खगोलीय ज्ञान का अद्भुत संगम है।

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