HomeBreakingशांतिनिकेतन में हिंदी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

शांतिनिकेतन में हिंदी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

◆एआई, कॉरपोरेट नियंत्रण और घटती संपादकीय स्वायत्तता पर विशेषज्ञों ने जताई चिंता

शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल। विश्वभारती विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग एवं केंद्रीय हिंदी निदेशालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “हिंदी पत्रकारिता का सफर : बदलती भाषा, बदलते तेवर” का सफल आयोजन हुआ। संगोष्ठी में देशभर से आए वरिष्ठ पत्रकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास से लेकर वर्तमान दौर में एआई, बाजारीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण के बीच मीडिया के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में ‘भाषा’ और ‘समागम’ पत्रिकाओं का लोकार्पण किया गया। मुख्य अतिथि विश्वभारती के कुलसचिव डॉ. विकास कुमार मुखोपाध्याय की उपस्थिति में प्रो. मुक्तेश्वर नाथ तिवारी ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘उदंत मार्तंड’ से डिजिटल युग तक हिंदी पत्रकारिता की यात्रा और उसकी जनपक्षधरता पर प्रकाश डाला। सत्र की अध्यक्षता प्रो. मृणाल कांति मंडल ने की। संचालन डॉ. सुभाष चन्द्र राय ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुकेश लोहार ने किया।

पत्रकारिता के मूल्यों और विश्वसनीयता पर विमर्श

संगोष्ठी के प्रथम दिवस के वैचारिक सत्रों में जयदीप चटर्जी, डॉ. बिप्लब लौह चौधरी, डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री और डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी ने भारतीय नवजागरण, ‘वंदे मातरम्’ के व्यापक अर्थ तथा निष्पक्ष पत्रकारिता के मूल्यों पर अपने विचार रखे।

द्वितीय सत्र में डॉ. गणेश रजक, डॉ. श्रीकांत द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. भारतीय वसंत कुमार और प्रो. हरिश्चंद्र मिश्र ने प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता, तटस्थता और पत्रकारिता के मूलभूत सरोकारों पर चर्चा की।

सांस्कृतिक संध्या में संगीत भवन के कलाकारों ने प्रस्तुति दी। डॉ. मनोज कुमार शर्मा के सितार वादन के साथ विश्वजीत साहू ने तबले पर युगलबंदी की। विभाग के विद्यार्थियों ने भी विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

एआई और बाजारीकरण के दौर में पत्रकारिता

संगोष्ठी के दूसरे दिन के प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. रामेश्वर मिश्र ने की। इस दौरान ‘दिनमान’ और ‘विशाल भारत’ जैसी कालजयी पत्रिकाओं के हिंदी पत्रकारिता में योगदान को याद किया गया। डॉ. उत्कर्ष सिन्हा और डॉ. मनोज कुमार शुक्ला ने घटती संपादकीय स्वायत्तता और बढ़ते बाजारीकरण पर चिंता व्यक्त की।

डॉ. मयंक भार्गव ने चैटजीपीटी और ‘अनुवादिनी ऐप’ जैसे एआई उपकरणों के दौर में समाचारों की सत्यता और विश्वसनीयता से जुड़े प्रश्नों पर विचार रखा। डॉ. रंजना शर्मा ने हिंदी पत्रकारिता और भाषा पर ‘हिंग्लिश’ के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया।

द्वितीय सत्र में प्रो. शकुन्तला मिश्र, डॉ. प्रमोद शर्मा, डॉ. राजीव रंजन प्रसाद, डॉ. राहुल सिंह, डॉ. राजू कुमार और डॉ. श्रुति कुमुद ने कॉरपोरेट प्रभाव, प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में गिरावट, पूर्वोत्तर भारत की उपेक्षा तथा स्थानीय पत्रकारों के उत्पीड़न जैसे विषयों पर चर्चा की।

शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र

संगोष्ठी का तृतीय सत्र शोधार्थियों को समर्पित रहा। इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार डॉ. भारतीय बसंत कुमार ने की। इस सत्र में अमित कुमार, अमित सिंह, मम्पी शर्मा, शिवम कुमार, जेम्स हांसदा, निकिता कुमारी, अन्वेषा कबीरत्ना, बुधुराम बेहेरा, मानसी कुमारी, अमन कुमार होली और चिराग शर्मा ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

दूसरे दिन की सांस्कृतिक संध्या में विश्वभारती के परीक्षा विभाग में कार्यरत श्री रतन ओझा तथा संगीत भवन के शिल्प अध्यापक प्रभात जी के साथ अनुभव चौधरी और अशोक ने संगीत प्रस्तुति दी। विभाग के विद्यार्थियों ने भी सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए।

आश्रम संगीत के साथ हुआ समापन

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर डॉ. सुभाष चन्द्र राय, मंचासीन श्रीमती अनीता डगोरे और श्री हकीकत सहित अन्य उपस्थित रहे। विभागाध्यक्ष डॉ. जगदीश भगत के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का आधिकारिक समापन हुआ। अंत में आश्रम संगीत की प्रस्तुति के साथ संगोष्ठी का समापन किया गया।

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