-आरोग्य के देवता धन्वंतरि जयंती और महालक्ष्मी पूजन से बढ़ेगा ऐश्वर्य, प्रदोष काल में दीपदान से दूर होगा अकाल मृत्यु का भय
-बर्तन व स्वर्ण-रजत आभूषणों की खरीदारी का रहेगा विशेष विधान, कुम्भ, वृष और सिंह लग्न में होंगे अनुष्ठान
देश वाणी। दिलीप दुबे
मोतिहारी। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर इस वर्ष प्रदोष व्रत, धन्वंतरि जयंती और धनत्रयोदशी (धनतेरस) का पावन पर्व एक ही दिन शुक्रवार, 06 नवम्बर को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। शास्त्रीय मान्यताओं और पंचांगीय गणना के अनुसार, प्रदोष काल में त्रयोदशी तिथि की प्राप्ति होने के कारण इस दिन का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है।
छोटा बरियारपुर महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान (वेद विद्याल के प्राचार्य, आचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने बताया कि समुद्र मंथन के दौरान इसी तिथि पर भगवान धन्वंतरि अमृत कलश और माता लक्ष्मी के साथ प्रकट हुए थे। इस प्रतीक स्वरूप ऐश्वर्य, सुख और समृद्धि की वृद्धि के लिए इस दिन शुभ मुहूर्त में नए बर्तन, सोना, चांदी और अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदकर घर लाने की प्राचीन परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन धन का अपव्यय रोकने से पूरे वर्ष धन का संचय और बरकत बनी रहती है।
आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि का अवतरण
भागवत महापुराण के अनुसार, भगवान विष्णु के अंशावतार ही कालांतर में भगवान धन्वंतरि के रूप में प्रसिद्ध हुए और संपूर्ण मानवता को आयुर्वेद का उपहार दिया। कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन ही उनका आविर्भाव हुआ था, इसलिए हर वर्ष इस तिथि को आरोग्य के देवता के रूप में उनकी जयंती धूमधाम से मनाई जाती है।
यमराज की प्रसन्नता के लिए दीपदान
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस की संध्या पर प्रदोष काल में जो श्रद्धालु अपने घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाते हैं, उन्हें अकाल मृत्यु या दुर्मरण का भय नहीं रहता। इस दिन संध्या के समय दीपदान करने से मृत्यु के देवता यमराज सहित मां लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
खरीदारी और लक्ष्मी पूजन के लिए प्रमुख शुभ मुहूर्त
कुम्भ लग्न में दिन के 01:07 बजे से 02:39 बजे तक, वृष लग्न में सायंकाल 05:45 बजे से रात्रि 07:42 बजे तक तथा निशीथकाल सिंह लग्न में रात्रि में 12:13 बजे से 02:27 बजे तक विशेष पूजन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए सर्वोत्तम समय है।



