विगत दिनों हुए छात्र आंदोलन ने देश में मीडिया की भूमिका को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। नीट पेपर लीक के विरोध में छात्र संगठनों और विभिन्न सामाजिक समूहों ने जंतर-मंतर सहित कई स्थानों पर आंदोलन किया। इस आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक ने भी सरकार का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन घटनाओं ने केवल शिक्षा व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता और उसकी प्राथमिकताओं पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए।
आंदोलन के दौरान कुछ स्थानों पर टीवी पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार की घटनाएँ भी सामने आईं। यह पूरी तरह निंदनीय है। लोकतंत्र में पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि समाज के एक वर्ग में टीवी मीडिया के प्रति अविश्वास लगातार बढ़ा है। यह अविश्वास अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि वर्षों से मीडिया की बदलती कार्यशैली का परिणाम है।
एक समय था जब बड़े जनआंदोलनों की पहचान टीवी कैमरों से होती थी। 2011 के अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, 2012 के निर्भया आंदोलन या उससे पहले के अनेक किसान एवं सामाजिक आंदोलनों को राष्ट्रीय समाचार चैनलों ने लगातार लाइव कवरेज दी। उस दौर में 24 घंटे के समाचार चैनलों के विस्तार ने आंदोलनों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया। हालांकि उस समय भी मीडिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते थे, लेकिन मैदान से विस्तृत रिपोर्टिंग और लंबी लाइव कवरेज अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती थी।
समय के साथ समाचार उद्योग का स्वरूप तेजी से बदला। समाचार चैनलों के बीच दर्शकों की संख्या (TRP) हासिल करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ती गई। 1998 में शुरू हुई टीवी रेटिंग प्रणाली को बाद में अधिक व्यवस्थित रूप से मापा जाने लगा और आज विज्ञापन राजस्व का बड़ा हिस्सा दर्शकों की संख्या पर निर्भर करता है। परिणामस्वरूप कई चैनलों पर गहन रिपोर्टिंग की जगह तेज़ बहस, सनसनीखेज प्रस्तुतिकरण और स्टूडियो आधारित टकराव ने अधिक स्थान लेना शुरू कर दिया।
2020 में सामने आए कथित TRP हेरफेर मामले ने भी इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके बाद प्रसारण रेटिंग मापने वाली संस्था BARC ने समाचार चैनलों की साप्ताहिक रेटिंग कुछ समय के लिए स्थगित कर दी थी। इस पूरे विवाद ने यह बहस तेज कर दी कि कहीं टीआरपी की दौड़ पत्रकारिता की प्राथमिकताओं पर तो हावी नहीं हो रही।
उधर इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच ने सूचना जगत का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया। भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 90 करोड़ से अधिक पहुँच चुकी है, जबकि करोड़ों लोग प्रतिदिन फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और यूट्यूब जैसे मंचों का उपयोग करते हैं। ऐसे में किसी भी आंदोलन या घटना की तस्वीरें, वीडियो और प्रत्यक्ष जानकारी कुछ ही मिनटों में देशभर में फैल जाती हैं।
नीट आंदोलन के दौरान भी यही देखने को मिला। अनेक लोगों का मानना था कि मुख्यधारा के कुछ टीवी चैनलों ने आंदोलन की मांगों की अपेक्षा राजनीतिक विमर्श को अधिक प्राथमिकता दी। इसके विपरीत सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों ने घटनास्थल से लगातार वीडियो, लाइव प्रसारण और विस्तृत रिपोर्ट साझा की। लोगों ने केवल समाचार प्राप्त नहीं किए, बल्कि स्वयं भी वीडियो, फोटो और अपनी राय साझा कर सूचना प्रवाह का हिस्सा बन गए।
आज सोशल मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनमत निर्माण का प्रभावशाली मंच बन चुका है। यही कारण है कि कई बार किसी मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस पहले सोशल मीडिया पर शुरू होती है और उसके बाद मुख्यधारा का मीडिया उसे प्रमुखता देता है।
हालाँकि यह भी ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया पूरी तरह दोषरहित नहीं है। यहाँ अफवाहें, भ्रामक सूचनाएँ और अपुष्ट दावे भी बहुत तेजी से फैलते हैं। इसलिए केवल सोशल मीडिया या केवल टीवी मीडिया—दोनों में से किसी एक पर पूर्ण निर्भरता उचित नहीं है। जिम्मेदार पत्रकारिता और तथ्य-जांच दोनों माध्यमों के लिए समान रूप से आवश्यक हैं।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसी सरकार, विपक्ष या विचारधारा का पक्ष लेना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष और संतुलित पत्रकारिता करना है। जब मीडिया सत्ता से सवाल पूछता है, विपक्ष की भी समीक्षा करता है और जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देता है, तभी उसका विश्वास कायम रहता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि टीवी मीडिया टीआरपी की अंधी दौड़ से ऊपर उठकर जनसरोकारों को प्राथमिकता दे। साथ ही सोशल मीडिया का उपयोग भी जिम्मेदारी और तथ्यपरकता के साथ हो। जनता अब पहले की तुलना में अधिक जागरूक है और उसके पास सूचना प्राप्त करने के अनेक विकल्प हैं। इसलिए किसी भी मीडिया संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी न टीआरपी है और न ही वायरल वीडियो, बल्कि जनता का विश्वास है। यही विश्वास भविष्य की पत्रकारिता की सबसे बड़ी कसौटी भी होगा।
रौशन कुमार पाण्डेय
स्वतंत्र पत्रकार












