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Sunday, January 11, 2026
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तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन का बयान – “संस्कृत मरी हुई भाषा है” – छिड़ी राजनीति बहस

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जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 24 नवम्बर ::

भारत भाषाओं का देश है, जहां 121 भाषाएँ, 1600 से अधिक उपभाषाएँ, हजारों लिपियाँ और समृद्ध साहित्यिक परंपराएँ हैं। ऐसे संवेदनशील भाषाई परिदृश्य में जब भी कोई राजनीतिक नेता भाषा पर टिप्पणी करता है, उसका असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि संस्कृति, पहचान, इतिहास और अस्मिता के सवालों को छू जाता है।

लेखक, जितेन्द्र कुमार सिन्हा, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के पूर्व पदाधिकारी हैं।

तमिलनाडु के डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन का हालिया बयान कि “संस्कृत एक मृत भाषा है, केंद्र सरकार तमिल की उपेक्षा कर रही है।” ने पूरे देश में नई बहस को जन्म दिया है।

इस बयान ने उत्तर बनाम दक्षिण, संस्कृत बनाम तमिल, केंद्र बनाम राज्य, और सांस्कृतिक बनाम राजनीतिक विमर्श को फिर सुर्खियों में ला दिया है।

क्या संस्कृत वास्तव में ‘मृत’ है? क्या तमिल की उपेक्षा हो रही है? क्या भाषा-नीति राजनीतिक हथियार बन रही है? चेन्नई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि “केंद्र सरकार ने संस्कृत पर 2,500 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जबकि तमिल जैसी प्राचीन और समृद्ध भाषा को केवल 150 करोड़ रुपए दिए हैं। संस्कृत अब एक मृत भाषा है, मगर केंद्र की प्राथमिकता में सबसे ऊपर है।” बयान में दो प्रमुख बिंदु थे एक संस्कृत को ‘मृत भाषा’ कहना और दूसरा तमिल के प्रति ‘उपेक्षा’ का आरोप लगाना। इन दो बातों ने राजनीतिक भूचाल ला दिया है। जहाँ भाजपा और दक्षिणपंथी समूहों ने इसे भारत की मूल संस्कृति पर हमला बताया है, वहीं डीएमके समर्थकों ने इसे सांस्कृतिक अधिकारों की लड़ाई कहा है।

डीएमके लंबे समय से संस्कृत और हिन्दू को ‘थोपे जाने वाली भाषा’ मानती रही है। उनकी विचारधारा में तमिल पहचान, द्रविड़ गौरव और उत्तर भारतीय ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ का विरोध शामिल है। डीएमके को लगता है कि नई शिक्षा नीति संस्कृत एव हिन्दी को बढ़ावा देती है। तमिल बनाम संस्कृत की बहस डीएमके के लिए अंदरूनी राजनीतिक ताकत को मजबूत करने का साधन भी हो सकता है।

उदयनिधि का तर्क यह था कि संस्कृत बोलने वालों की संख्या बहुत कम है, इसलिए इसे मृत भाषा घोषित कर देना चाहिए। पर भाषा विज्ञान का एक अलग दृष्टिकोण है। भाषा विज्ञान के अनुसार मृत भाषा (dead language) वह होती है जिसे कोई समुदाय मातृभाषा के रूप में नहीं बोलता है, जिसका दैनिक वार्तालाप में उपयोग नहीं होता है, जिसकी साहित्यिक परंपरा सक्रिय नहीं होती है।

मातृभाषा के रूप में संस्कृत बहुत कम लोग बोलते हैं, लेकिन संस्कृत की साहित्यिक परंपरा आज भी जीवित है, हजारों छात्र संस्कृत पढ़ते हैं। संस्कृत में हर वर्ष नई पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, रामायण, महाभारत, वेद, उपनिषद आदि अभी भी वैश्विक अध्ययन के केंद्र हैं, वहीं आयुर्वेद, योग, दर्शन, गणित, विज्ञान में संस्कृत का उपयोग सक्रिय है। यह ‘लैटिन’ की तरह हो सकता है, दैनिक भाषण में कम, परंतु ज्ञान, दर्शन और अकादमिक जगत में अत्यंत प्रभावशाली है।

उदयनिधि के बयान का दूसरा हिस्सा तमिल की उपेक्षा से जुड़ा था। तमिल वास्तव में दुनिया की सबसे प्राचीन, निरंतर जीवित भाषाओं में शामिल है। 5,000 साल पुरानी साहित्यिक परंपरा है। संगम साहित्य विश्व की अनमोल धरोहर है, यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त कई तमिल शास्त्रीय ग्रंथ है, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर में तमिल बड़े समुदाय की भाषा है और विश्व की पाँच शास्त्रीय भाषाओं में एक है। तमिल की सांस्कृतिक ताकत इतनी विशाल है कि इसे ‘जीवित सभ्यता’ भी कहा जाता है।

दोनों भाषाओं की तुलना करना एक तरह से दो अलग करोड़ों साल पुरानी विरासतों की तुलना करना है। दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ, इतिहास और योगदान हैं। संस्कृत का योगदान वेद, पुराण, दर्शन, काव्य, भारत की कई भाषाओं का मूल, वैदिक गणित, आयुर्वेद, योग, पहली व्याकरण पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ है। तमिल का योगदान संगम साहित्य, शैव और वैष्णव भक्ति परंपरा, थिरुक्कुरल, तिरुवल्लुवर, द्रविड़ कला, स्थापत्य और दर्शन का विकास है । संस्कृत और तमिल दोनों भारत की आत्मा हैं। एक को ऊपर उठाकर दूसरे को नीचा दिखाना सांस्कृतिक सद्भाव के खिलाफ है।

भारत में भाषा और राजनीति का संबंध हमेशा गहरा रहा है। तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी आंदोलन हुआ, जिनमें तमिल पहचान राजनीति का उदय हुआ। इसी आंदोलन से द्रविड़ पार्टियाँ मजबूत हुईं। केंद्र की भाषा नीति पर हमेशा बहस होती रही है। कई राज्यों को लगता है कि संस्कृत और हिन्दी को अन्य भाषाओं की तुलना में अधिक बढ़ावा मिलता है। डीएमके और कुछ अन्य दक्षिणी राज्य मानता है कि नई शिक्षा नीति संस्कृत और हिन्दी को प्राथमिकता देती है।

उदयनिधि ने कहा है कि केन्द्र सरकार संस्कृत पर 2,500 करोड़ और तमिल पर 150 करोड़ रुपए खर्च किया है। पहली बात, यह राशि कई वर्षों के अलग-अलग कार्यक्रमों से जुड़ी है। दूसरी बात, तमिल पर भी विभिन्न विभागों द्वारा कई परियोजनाएँ चलाई जाती हैं जिनकी राशि अलग से होती है।

लेकिन डीएमके का तर्क है कि तमिल, जो दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा है, उसे ‘अंतरराष्ट्रीय भाषा’ के रूप में बढ़ावा देना चाहिए। केंद्र को तमिल विश्वविद्यालय, तमिल शोध संस्थान, संगम साहित्य संरक्षण पर और निवेश करना चाहिए। यह तर्क राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है।

जब दोनों भाषाएँ हजारों सालों तक समानांतर चलीं, एक-दूसरे को प्रभावित करती रहीं, तो आज इसे राजनीतिक विभाजन का कारण क्यों बनाया जा रहा है? संस्कृत ने तमिल को दर्शन, साहित्यिक संरचना, धार्मिक ग्रंथ और मंदिर स्थापत्य की भाषा दिया है। वहीं तमिल ने संस्कृत को द्रविड़ संस्कृति की मजबूत जड़ें, भक्ति आंदोलन, शैव-वैष्णव परंपराएँ और दक्षिण भारतीय मंदिरों का समृद्ध विकास दिया है। दोनों भाषा भारत की सांस्कृतिक धरोहर के दो पर्वत हैं, जिनकी तुलना नहीं की जा सकती है।

जब कोई नेता किसी भाषा को ‘मृत’ कहता है, तो वह सिर्फ भाषाई टिप्पणी नहीं करता है बल्कि एक सांस्कृतिक संदेश देता है। उदयनिधि का यह बयान अब डीएमके की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है केंद्र की सांस्कृतिक राजनीति के विरुद्ध, तमिल अस्मिता को मजबूत करने के लिए, द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा को आगे लाने के लिए, भाजपा से वैचारिक टकराव को और तेज करने के लिए, लेकिन यह बयान मिलाप की बजाय विवाद को जन्म देता है।

भाजपा नेताओं ने कहा है कि संस्कृत को मृत कहना भारत की संस्कृति का अपमान है। यह ‘एंटी-इंडिया’ बयान है। तमिल और संस्कृत दोनों भारत की धरोहर हैं। एक भाषा को दूसरे के खिलाफ खड़ा करना गलत है। तमिलनाडु में भाजपा अपने पांव फैलाने की कोशिश कर रही है। इसलिए ऐसे विवाद भाजपा को ‘हिंदुत्व’ के मुद्दे उठाने का अवसर भी देता है।

भाषा केवल संचार नहीं है, यह पहचान, संस्कृति, गौरव, इतिहास और राजनीति है। यही कारण है कि उत्तर भारत में हिन्दी, दक्षिण में तमिल, पश्चिम में मराठी-गुजराती, पूर्व में बंगाली-ओड़िया और हिमालयी क्षेत्रों में नेपाली-भूटिया, हर हिस्से की भाषा वहाँ की अस्मिता बन जाती है। कोई भी नेता भाषा पर टिप्पणी करे तो वह केवल शब्द नहीं बोलता है, बल्कि वह एक पूरी संस्कृति को संबोधित करता है।

भारत में आज भी भाषाई असमानता, सांस्कृतिक वर्चस्व का आरोप, उत्तर-दक्षिण विभाजन और केंद्र-राज्य भाषा नियंत्रण का विवाद जैसे मुद्दे मौजूद है। जबकि एक संतुलित भाषा नीति में होना चाहिए, सभी भारतीय भाषाओं के लिए बराबर निवेश, क्षेत्रीय भाषाओं में उच्च शिक्षा, संस्कृति आधारित शोध, तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, मराठी जैसी शास्त्रीय भाषाओं का समान संरक्षण, मातृभाषा-आधारित शिक्षा और भाषाओं को राजनीतिक विवादों से अलग रखना।

भारत के लिए आदर्श रास्ता यह है कि संस्कृत को उसके ज्ञान और शास्त्रीय मूल्य के कारण संरक्षित किया जाए, तमिल को विश्व की धरोहर भाषा के रूप में प्रचारित किया जाए, किसी भी भाषा को ‘मृत’ कहना बंद किया जाए, केंद्र और राज्यों के बीच भाषाई सम्मान का संतुलन बनाया जाए, सांस्कृतिक श्रेष्ठता का कोई दावा न किया जाए और भाषाओं को प्रतियोगिता नहीं, सहयोग का साधन माना जाए। जब भारत की सभी भाषाएँ संस्कृत से लेकर तमिल तक मिलकर आगे बढ़ेंगी, तभी भारत का सांस्कृतिक सामर्थ्य बढ़ेगा।

उदयनिधि स्टालिन का बयान गलत हो सकता है, अनुचित भी हो सकता है, लेकिन उसने एक महत्वपूर्ण बहस जरूर छेड़ दी है। इस विवाद ने यह सिद्ध किया है कि भाषाएँ कभी मृत नहीं होती है। वे समाज, संस्कृति और भावनाओं के साथ जीवित रहती है। वे राजनीति की नहीं, लोगों की हैं। भाषाओं को लड़ाया नहीं, अपनाया जाना चाहिए। संस्कृत और तमिल दोनों भारत की आत्मा हैं। एक को उठाकर दूसरे को गिराना सभ्यता का अपमान है।
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