HomeBIHARमोतिहारीशरद् पूर्णिमा पर प्रकृति, आस्था और आरोग्य का अनूठा संगम

शरद् पूर्णिमा पर प्रकृति, आस्था और आरोग्य का अनूठा संगम

. 16 कलाओं से परिपूर्ण चंद्रमा की चांदनी में रखी खीर खाने से बढ़ती है आरोग्यता

  • माता लक्ष्मी और महर्षि वाल्मीकि जयंती के साथ मनाया गया प्रकाश पर्व

देश वाणी। दिलीप दुबे

मोतिहारी। भारतीय संस्कृति में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन दर्शन के जीवंत प्रतीक हैं। आश्विन शुक्लपक्ष की शरद् पूर्णिमा इसका सबसे सुंदर उदाहरण है, जो प्रकृति, स्वास्थ्य और आध्यात्म का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है। इस वर्ष रात्रि व्यापिनी पूर्णिमा पर यह पर्व अत्यंत उल्लास के साथ रविवार को मनाया जायेगा।

महर्षिनगर छोटा बरियारपुर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय के अनुसार, वर्ष में केवल इसी एक दिन चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होता है और उसकी किरणों में अमृत समान गुण होते हैं। मान्यता है कि इस रात्रि गाय के दूध, घी और शक्कर से बनी खीर को खुले आसमान के नीचे चांदनी में रखने से उसमें औषधीय व अमृततुल्य गुण समाहित हो जाते हैं। दूसरे दिन इस प्रसाद को ग्रहण करने से बल, बुद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

लोक परंपरा में इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इस रात्रि माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जागने वाले भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इस दिन विधि-विधान से लक्ष्मी पूजन, श्रीसूक्त पाठ और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। साथ ही, भगवान श्रीकृष्ण के रासलीला प्रसंग से जुड़े होने के कारण इसे रास पूर्णिमा और कौमुदी महोत्सव के रूप में भी उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।

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