Bettiah |अनिल शर्मा|
अष्टयाम, हनुमान आराधना और लखराव पूजन के साथ शादियों के लिए भी प्रसिद्ध है स्थान, नेपाली शासनकाल से जुड़ी है मान्यता
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मझौलिया। पश्चिम चंपारण जिले के मझौलिया प्रखंड मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर डुमरी पंचायत में स्थित पौराणिक जिन बाबा का स्थान हिंदू–मुस्लिम एकता और साझा आस्था की अनूठी मिसाल पेश करता है। यहां आस्था के आगे मजहब की दीवारें छोटी पड़ जाती हैं। श्रद्धालु अपनी मुरादें लेकर पहुंचते हैं और जिन बाबा के दरबार में माथा टेककर सुख–समृद्धि की कामना करते हैं।
पीपल की टहनियों पर बांधते हैं मन्नतों की पर्चियां
इस धार्मिक स्थल की सबसे अनूठी परंपरा पीपल के पेड़ से जुड़ी है। श्रद्धालु कागज पर अपनी परेशानियां और मनोकामनाएं लिखकर पीपल की टहनियों पर बांध देते हैं। स्थानीय मान्यता है कि ऐसा करने से उनकी मुरादें पूरी होती हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु प्रसन्नता के साथ इस स्थान के विकास में भी सहयोग करते हैं। लोगों की आस्था और सामूहिक प्रयासों से कभी घने जंगलों के बीच स्थित यह जगह आज एक व्यवस्थित और आकर्षक धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो चुकी है।
सोमवार को हिंदू, शुक्रवार को मुस्लिम श्रद्धालुओं की भीड़
जिन बाबा के स्थान पर प्रतिदिन श्रद्धालुओं का आना–जाना लगा रहता है। हालांकि, सोमवार को हिंदू श्रद्धालुओं और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय के लोगों की विशेष भीड़ उमड़ती है। यहां खीर का भोग लगाया जाता है और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है। कई लोग प्रसाद अपने घर भी ले जाते हैं।
इस स्थान की ख्याति आसपास के इलाकों तक ही सीमित नहीं है। बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। विभिन्न समुदायों के लोगों की सहभागिता इस स्थल को सामाजिक सद्भाव और आपसी विश्वास का प्रतीक बनाती है।
धार्मिक अनुष्ठानों के साथ शादियों की भी रौनक
जिन बाबा का परिसर धार्मिक अनुष्ठानों के साथ वैवाहिक आयोजनों के लिए भी जाना जाता है। शादी–विवाह के मौसम में यहां विशेष चहल–पहल रहती है। कई जोड़े यहां विवाह के बंधन में बंधकर जिन बाबा का आशीर्वाद लेते हैं और अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत करते हैं।
परिसर में अष्टयाम, हनुमान आराधना और लखराव पूजन समेत विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालुओं के सहयोग से यहां यज्ञ भवन, पूजा मंडप, धर्मशाला, विवाह भवन और शौचालय जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं। इन सुविधाओं से धार्मिक आयोजनों और वैवाहिक कार्यक्रमों में आने वाले लोगों को सहूलियत मिलती है।
नेपाली शासनकाल से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय जानकारों के अनुसार, जिन बाबा के स्थान की उत्पत्ति के संबंध में कोई निश्चित ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, स्थानीय मान्यता है कि जब इस क्षेत्र में नेपाली शासन का प्रभाव था और चारों ओर घना जंगल फैला हुआ था, उसी समय से इस स्थल की परंपरा चली आ रही है।
स्थानीय लोगों विनोद गिरी, विजय गिरी, दुखी पंडित, असेसर भगत, अनिल गिरी, उपेंद्र कुमार, संजीव गिरी, शाहिद खान और सहाबुन नेशा के अनुसार, यह स्थान लंबे समय से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। श्रद्धालुओं का विश्वास, सामूहिक सहभागिता और आपसी सहयोग ही इस धार्मिक स्थल के विकास की प्रमुख ताकत है। जिन बाबा का दरबार आज भी विभिन्न समुदायों के लोगों को एक साथ जोड़ने और सामाजिक सद्भाव का संदेश देने का काम कर रहा है।



