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दीपावली पर विशेष:सृष्टि के आदिकाल से चली आ रही है दीपोत्सव की परंपरा, जानें शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

देश वाणी। दिलीप दुबे

मोतिहारी। सनातन संस्कृति में प्रकाश और ऐश्वर्य के महापर्व दीपावली की परंपरा सृष्टि के आदिकाल से चली आ रही है। वेद, पुराणों और हिंदू धर्मग्रंथों में इस महान पर्व का विस्तृत उल्लेख मिलता है। महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान (वेद विद्यालय) के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय के अनुसार, समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी के प्रादुर्भाव, भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन, नरकासुर वध और राजा बलि के राज्यकाल से ही दीपमालिका की परंपरा का निर्वहन होता आ रहा है।

दीपावली के दिन धन की देवी माँ लक्ष्मी, विघ्नहर्ता भगवान गणेश और धनाध्यक्ष कुबेर की संयुक्त पूजा से परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस दिन घर की साफ-सफाई कर रात्रि में प्रदोष काल और अमावस्या तिथि के संयोग में दीप जलाने का विधान है, जिससे दरिद्रता दूर होती है और माँ लक्ष्मी का आगमन होता है।

विशेष पूजन सामग्री व विधान: पूजन में कमल का पुष्प, कमलगट्टा, नारियल, हल्दी की गांठ, खड़ा धनिया, कौड़ी, धान का लावा और श्रीसूक्त व कनकधारा स्तोत्र का पाठ अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। दीप प्रज्वलन में गाय के घी का दीपक सर्वोतम तथा तेल का दीपक मध्यम फलदायी होता है।

पूजा के लिए प्रमुख स्थिर लग्न मुहूर्त:

  • वृष लग्न (प्रदोषकाल): सायं 05:37 से रात्रि 07:34 बजे तक
  • सिंह लग्न (निशीथकाल): रात्रि 12:05 से 02:19 बजे तक
  • कुम्भ लग्न: दोपहर 01:00 से 02:31 बजे तक
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