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पितृपक्ष 27 सितंबर से, 10 अक्टूबर को पितृ विसर्जन, जानिए तर्पण और श्राद्ध से जुड़ी खास बातें

देश वाणी। दिलीप दुबे

मोतिहारी। सनातन धर्म में देव पूजन की तरह ही पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों का विधिवत तर्पण और श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना कल्याणकारी

शहर के महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय के अनुसार, देवताओं की पूजा से पहले अपने पूर्वजों का स्मरण और उनका तर्पण करना अधिक कल्याणकारी माना गया है। उन्होंने बताया कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितृलोक पृथ्वी के सबसे करीब माना जाता है। इसी वजह से इस अवधि को पितृपक्ष या महालया कहा जाता है।

27 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष

इस वर्ष पितृपक्ष पखवारा 27 सितंबर, रविवार से प्रारंभ होगा। वहीं 10 अक्टूबर, शनिवार को स्नान-दान के साथ सर्वपितृ अमावस्या यानी पितृ विसर्जन होगा। इस दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठान उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक माने जाते हैं।

पहले दिन से शुरू होता है तर्पण

सुशील कुमार पाण्डेय ने बताया कि पितृपक्ष के पहले दिन से ही जल से तर्पण की शुरुआत हो जाती है। इसके बाद परिवार के जिस सदस्य की जिस तिथि को मृत्यु हुई हो, उसी तिथि को उनके नाम से पिंडदान और श्राद्ध कर्म किया जाता है।

मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं तो अमावस्या को करें श्राद्ध

जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथि मालूम नहीं होती, वे सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं। इस दिन ऐसे सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा बताई गई है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हो।

श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण जरूरी

पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद कर उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा के साथ किए गए इन कर्मों से पितर तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को सुख, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

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