माला सिन्हा
पीपराकोठी : खरीफ मौसम के दौरान अधिक वर्षा, अस्थायी जलभराव और खेतों में निकास की समस्या मक्का उत्पादन की प्रमुख बाधाओं में से हैं. मक्का जलभराव के प्रति संवेदनशील फसल है और जड़ क्षेत्र में लंबे समय तक पानी रहने से ऑक्सीजन की कमी, जड़ वृद्धि में अवरोध, पोषक तत्वों का कम अवशोषण तथा अंततः उपज में कमी हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में रेज्ड बेड अर्थात् उठी हुई क्यारियों पर खरीफ मक्का की खेती एक प्रभावी संसाधन-संरक्षण एवं जलवायु-स्मार्ट तकनीक के रूप में उभर सकती है. इस पद्धति में मक्का की बुवाई लगभग 67–70 सेमी चौड़े उठे हुए बेड पर की जाती है तथा बेडों के बीच बनी नालियाँ अधिक वर्षा के समय अतिरिक्त पानी को खेत से बाहर निकालने में सहायता करती हैं. प्रत्येक बेड पर एक कतार में पौधों को लगभग 18–20 सेमी की दूरी पर तथा बीज को लगभग 4–5 सेमी गहराई पर बोना उपयुक्त रहता है. इससे लगभग 70–75 हजार पौधों प्रति हेक्टेयर की वांछित पौध संख्या प्राप्त की जा सकती है. पूर्वी चम्पारण की परिस्थितियों में मानसून की सक्रियता एवं पर्याप्त मृदा नमी को देखते हुए मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बुवाई पूरी कर लेना लाभकारी रहता है. समय पर रबी फसल लेने के उद्देश्य से लगभग 90–105 दिन अवधि वाले उपयुक्त मध्यम या अल्प अवधि के संकर का चयन विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है. रेज्ड बेड तकनीक का सबसे महत्वपूर्ण लाभ बेहतर जल निकास है. पौधों की जड़ें ऊँचे बेड पर रहने के कारण वर्षा के बाद लंबे समय तक पानी में डूबी नहीं रहतीं. इससे जड़ क्षेत्र में वायु संचार बना रहता है, जड़ों का विकास बेहतर होता है तथा नत्रजन, फॉस्फोरस और अन्य पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है. उपयुक्त बेड प्लांटर के उपयोग से बेड निर्माण, बीज की सटीक बुवाई तथा उर्वरक की बैंड प्लेसमेंट एक ही संचालन में की जा सकती है, जिससे श्रम, समय, ईंधन और कृषि यंत्र के उपयोग में भी बचत संभव है. पोषक तत्वों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए तथा विशेषकर नत्रजन को विभाजित मात्रा में देने से भारी वर्षा के दौरान लीचिंग अथवा अन्य हानियों को कम किया जा सकता है. इस तकनीक का लाभ केवल मक्का की उपज बढ़ाने तक सीमित नहीं है. सामान्य समतल बुवाई की तुलना में बेहतर जल निकास, समान पौध स्थापना और प्रभावी संसाधन उपयोग के कारण परिस्थितियों के अनुसार लगभग 15–25 प्रतिशत तक उपज लाभ प्राप्त किया जा सकता है. पौधों की वास्तविक वृद्धि, मृदा प्रकार, वर्षा की मात्रा, हाइब्रिड प्रभेद, पोषण प्रबंधन और खेत के जल निकास पर निर्भर करेगी। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण इसका प्रभाव पूरे फसल चक्र पर पड़ता है. यदि खरीफ मक्का की बुवाई जून के दूसरे पखवाड़े में समय पर की जाए और 90–105 दिन अवधि वाले उपयुक्त हाइब्रिड प्रभेद का उपयोग किया जाए, तो फसल सामान्यतः सितम्बर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े में परिपक्व होकर कटाई के लिए उपलब्ध हो सकती है. इससे किसान खेत को समय पर खाली कर अक्टूबर में सरसों तथा नवंबर में गेहूँ की बुवाई निर्धारित अवधि में कर सकता है. पूर्वी चम्पारण में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि खरीफ फसल की कटाई में देरी होने पर रबी फसलों की बुवाई लगातार पीछे खिसकती जाती है. देर से बोया गया गेहूँ फरवरी–मार्च की बढ़ती गर्मी के प्रभाव में आ सकता है, जबकि सरसों की देर से बुवाई से उसकी वृद्धि अवधि और उत्पादकता प्रभावित हो सकती है. इस प्रकार रेज्ड बेड मक्का केवल खरीफ फसल की तकनीक नहीं, बल्कि मक्का–सरसों तथा मक्का–गेहूँ फसल प्रणाली को समयबद्ध रखने का प्रभावी माध्यम है. मक्का की कटाई भी उचित अवस्था में करना आवश्यक है. दाने के आधार पर ब्लैक लेयर बनने तथा भुट्टे के शारीरिक रूप से परिपक्व होने के बाद भुट्टों की कटाई की जा सकती है और उन्हें खेत से बाहर सुरक्षित स्थान पर सुखाया जा सकता है. इससे पूरे पौधे के अत्यधिक सूखने की प्रतीक्षा में खेत को अनावश्यक रूप से खाली रखने की जरूरत नहीं पड़ती और रबी फसल के लिए बहुमूल्य समय बचाया जा सकता है. जिले में कृषि के साथ पशुपालन का घनिष्ठ संबंध होने के कारण इस प्रणाली का एक अतिरिक्त लाभ पशु चारा उपलब्धता भी है. मुख्य दाना उत्पादन वाली मक्का फसल को बीच में काटना उचित नहीं है, लेकिन पौध संख्या समायोजन के समय निकले अतिरिक्त पौधों, खेत की मेड़ों या अलग बेड पर लगाए गए चारा मक्का तथा कटाई के बाद उपलब्ध हरे या अर्धहरे मक्का अवशेष का पशु चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है. भारी वर्षा या चारे की कमी वाले समय में यह पशुपालकों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकता है. मक्का अवशेष को चाफ या साइलेज के रूप में संरक्षित कर चारे की कमी की अवधि में भी उपयोग किया जा सकता है. इस प्रकार रेज्ड बेड पर खरीफ मक्का पूर्वी चम्पारण के लिए केवल अधिक उत्पादन की तकनीक नहीं, बल्कि जलभराव से सुरक्षा, बेहतर पोषक एवं जल उपयोग दक्षता, समय और ऊर्जा की बचत, पशु चारा उपलब्धता तथा रबी फसलों की समय पर बुवाई सुनिश्चित करने वाली समेकित कृषि तकनीक है. उपयुक्त हाइब्रिड प्रभेद का चयन, समय पर बुवाई, वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन और प्रभावी जल निकास के साथ इसका विस्तार जिले की मक्का आधारित फसल प्रणाली को अधिक उत्पादक, लाभकारी और जलवायु-अनुकूल बना सकता है.



