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माला सिन्हा
पीपराकोठी : बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लीची बागानों में इन दिनों लीची स्टिंक बग या लीची ‘बदबूदार बग’ का खतरा बढ़ रहा है. वैज्ञानिक नाम टेस्सारेटोमा जावानिका वाला यह कीट लीची उत्पादक किसानों के लिए गंभीर समस्या बन चुका है. भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुशहरी, मुजफ्फरपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2011 में झारखंड में इस कीट का बड़े पैमाने पर प्रकोप देखा गया था, जहां इससे करीब 80 प्रतिशत तक फसल को नुकसान हुआ। वर्ष 2018 में पूर्वी चंपारण के मेहसी प्रखंड के बरपुर और मिर्जापुर गांवों के लीची बागानों में इसकी मौजूदगी सामने आई. इसके बाद इसका फैलाव चकिया, मधुबन और कल्याणपुर प्रखंडों तक हो चुका है. प्रभावित बागानों में फल क्षति 70 से 100 प्रतिशत तक दर्ज की गई है.
इस संबंध में कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक डा अरविन्द कुमार सिंह ने बताया कि अगस्त-सितंबर लीची के लिए नई कोंपलों और बढ़वार का समय होता है. इसी दौरान वयस्क स्टिंक बग नई कोंपलों पर सक्रिय रहते हैं और आगामी शीतनिष्क्रियता की तैयारी करते हैं. इसलिए सर्दियों में जाने से पहले इसकी संख्या नियंत्रित करना बेहद महत्वपूर्ण है. अगस्त में बाग की नियमित निगरानी कर पत्तियों की निचली सतह, शाखाओं और नई कोंपलों पर अंडा-समूह तथा निम्फ के झुंड की जांच करनी चाहिए. विशेष रूप से बाग के बाहरी किनारों पर निगरानी जरूरी है, क्योंकि वयस्क कीट वहां अधिक एकत्रित होते हैं. अंडे या निम्फ दिखाई देने पर उन्हें सावधानीपूर्वक हटाकर नष्ट करने की सलाह दी गई है. लीची स्टिंक बग केवल फसल के लिए ही नुकसानदायक नहीं है, बल्कि इसे छेड़ने पर यह दुर्गंधयुक्त विषैला तरल छोड़ता है, जिससे त्वचा पर जलन और छाले हो सकते हैं. इसलिए किसान और मजदूर इसे हाथ से कुचलने से बचें तथा दस्ताने आदि का प्रयोग करें.
संक्रमित क्षेत्रों में सामूहिक रूप से कीट नियंत्रण करना जरूरी बताया गया है. सितंबर के पहले पखवाड़े में पहला छिड़काव तथा 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करने की सलाह दी गई है. अनुशंसित कीटनाशक की मात्रा और सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए. दूसरे छिड़काव में अलग रासायनिक समूह का कीटनाशक चुनने की सलाह दी गई है, ताकि कीट में प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो. इसके अलावा बाग में जलभराव नहीं होने देना, उचित जल निकासी रखना, पुराने और घने पेड़ों की छंटाई करना तथा आसपास मौजूद वैकल्पिक मेजबान पेड़ों की निगरानी करना जरूरी है. अंतिम मानसून वर्षा के बाद बाग की सफाई और लीची के तने पर चिपचिपा या प्लास्टिक बैरियर लगाने से भी कीट के पेड़ पर चढ़ने और छिपने की संभावना कम की जा सकती है. विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि केवल एक किसान के प्रयास से इस कीट पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है. पूरे प्रभावित क्षेत्र के किसानों को एक साथ और समन्वित तरीके से प्रबंधन करना होगा.












