HomeBIHARमोतिहारीतमसो मा ज्योतिर्गमय: गाँव की चौखट से जुड़ी अनोखी लोक परंपरा 'झिंझिया'

तमसो मा ज्योतिर्गमय: गाँव की चौखट से जुड़ी अनोखी लोक परंपरा ‘झिंझिया’

ग्रामीण लोक-संस्कृति में निहित है वेदों और पुराणों का ज्ञान

छेद वाले घड़े और दीप ज्योति से राक्षसी वृत्तियों का निवारण

अंधकार को चीरकर समाज में उजाला फैलाती लोक परंपरा

देश वाणी। दिलीप दुबे

मोतिहारी। भारतीय सनातन संस्कृति और लोक परंपराओं का अटूट रिश्ता हमारे प्राचीन ग्रंथों और वेदों से जुड़ा हुआ है। गाँव की माता-बहनें अनजाने ही कई ऐसी परंपराओं का निर्वहन करती हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शास्त्रों की वैचारिक और व्यवहारात्मक शिक्षाओं से जुड़ी होती हैं। ऐसी ही एक अनूठी और प्राचीन लोक परंपरा है ‘झिंझिया’, जो आज भी बिहार के ग्रामीण अंचलों में पूरी आस्था के साथ जीवित है।

वेदों से जुड़ी लोक परंपरा और झिंझिया का उद्गम

हमारे धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में ग्रामवचनं कुर्यात् यानी गाँव की परंपराओं का पालन करने का विधान बताया गया है। मोतिहारी, महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान (वेद विद्यालय) के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय के अनुसार, वेद और पुराणों में दीप तथा प्रकाश को अंधकार, माया और राक्षसी वृत्तियों का नाश करने का माध्यम माना गया है। प्राचीन काल में दुर्गा सप्तशती के अध्ययन के आधार पर गाँव की महिलाएं नवदुर्गा का स्वरूप धारण करती थीं। वे वस्त्राभूषण पहनकर हाथ में दुर्गा का खप्पर या ज्योति पात्र लेकर गाँव की सीमा का चक्कर लगाती थीं। समय के साथ यही झिलमिल-झिलमिल ज्योति और परंपरा आगे चलकर झिंझिया के रूप में प्रसिद्ध हो गई।

छिद्रयुक्त घड़े का रहस्य और दुष्ट शक्तियों का नाश

बिहार के ग्रामीण परिवेश में आज भी झिंझिया उत्सव का विशेष महत्व है। इस परंपरा के तहत महिलाएं सिर पर छिद्रयुक्त (छेद वाले) घड़े में जलता हुआ दीपक रखकर अनोखा नृत्य और अनुष्ठान करती हैं। इस ज्योति पुंज के माध्यम से महिलाएं मानो माँ दुर्गा का रूप धारण कर परिवार, समाज और गाँव का अहित करने वाली दुष्ट शक्तियों व राक्षसियों को खोज-खोज कर गाँव की सीमा से बाहर करती हैं। वहीं, पुरुष वर्ग नवरात्र के दौरान शक्ति की उपासना कर सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का संकल्प लेता है।

अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का शाश्वत संदेश

झिंझिया सिर्फ एक लोक नृत्य या उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ यानी अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के पावन भाव का जीवंत प्रतीक है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि कैसे प्रकाश की एक छोटी सी ज्योति हमारे जीवन से अज्ञानता और बुराई के अंधकार को दूर कर सकती है। आधुनिकता की दौड़ में आज भी हमारी यह ग्रामीण संस्कृति अपनी माटी की खुशबू और सनातन संस्कारों को संजोए हुए समाज को एक नई दिशा दे रही है।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

Most Popular