देश वाणी। दिलीप दुबे
मोतिहारी। आदि शिल्पी और संसार के पहले वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा का पावन पूजनोत्सव गुरुवार, 17 सितंबर को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। वैदिक काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार, इस दिन निर्माण कार्यों से जुड़े लोग, उद्योगपति और आमजन अपने आराध्य की विधिवत पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान (वेद विद्यालय) के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय के अनुसार, भगवान ब्रह्मा के पुत्र धर्म और उनके पुत्र वास्तुदेव के वंश में माता अंगीरसी की कोख से भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। पौराणिक संदर्भों के अनुसार राजा पुरूरवा के राज्य में आयोजित 12 वर्षीय यज्ञ की विशाल यज्ञशाला का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा किया गया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने ही सर्वप्रथम सत्ययुग के स्वर्गलोक की रचना की थी, जिसके पश्चात उन्होंने त्रेतायुग में ललंका, द्वापरयुग में द्वारका और कलियुग में हस्तिनापुर जैसे महान नगरों का निर्माण किया। वास्तुशास्त्र और निर्माण कला के देवता भगवान विश्वकर्मा की यह पूजा धन-धान्य, वैभव और सुखी जीवन प्रदान करने वाली बेहद मंगलकारी व फलदायी मानी जाती है।



