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स्वास्थ्य-सेवा क्षेत्र में सभी के लिये एक नूतन परिकल्पना
By Deshwani | Publish Date: 5/5/2017 2:40:39 PM
स्वास्थ्य-सेवा क्षेत्र में सभी के लिये एक नूतन परिकल्पना

के वी वेंकटसुब्रमण्यन

आईपीएन। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है और भारत आज पहले से ज्यादा स्वस्थ देश है। कई बीमारियां जैसे पोलियो, स्मॉल पॉक्स और गिनी के कृमि से होने वाले रोग का सफलतापूर्वक उन्मूलन किया जा चुका है। इसके अलावा शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर में काफी कमी आयी, इसके अलावा क्षय रोग, मलेरिया, एचआईवी संक्रमण और एड्स से होने वाली मौतों में गिरावट दर्ज की गयी है।

स्वास्थ्य सेवा, जो कि अर्थव्यवस्था के अहम क्षेत्रों में से एक है, में पहुंच और सेवाओं का दायरा बढ़ने और सरकारी तथा निजी क्षेत्र द्वारा इस क्षेत्र पर खर्च बढ़ाये जाने से इस क्षेत्र का तेज गति से विकास हुआ है। इसके अलावा सामाजिक बदलाव और बढ़ते शहरीकरण से गैर-संक्रामक बीमारियां जैसे ह्रदय रोग, मधुमेह और कैंसर भी तेजी से फैली हैं।

बुजुर्गों की बढ़ती संख्या की वजह से 2025 तक कुल जनसंख्या में इनकी तादाद 11 प्रतिशत हो जायेगी। जिसकी वजह से उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ेगी लेकिन महंगी होती स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से बीमा नहीं रखने वाले लोगों के लिये इसका खर्च वहन करना मुश्किल होगा।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में विसंगति को दूर करने और स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे को सुधारने के लिये सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 जारी की है। इसका उद्देश्य सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का लक्ष्य हासिल करना है ताकि सभी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें उचित दर पर उपलब्ध करायी जा सकें।

नीति का उद्देश्य उपचार का खर्च घटाकर और इसकी गुणवत्ता सुधारकर स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों की पहुंच में लाना है। पहले की तुलना में एक बड़ा बदलाव यह है कि नयी स्वास्थ्य नीति में स्वास्थ्य सेवाओं के दायरे को व्यापक बनाने में निजी क्षेत्र की अहम भूमिका को माना गया है।

स्वास्थ्य नीति एक व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पैकेज उपलब्ध करायेगी जिसमें मुख्य गैर-संक्रामक बीमारियां, मानसिक स्वास्थ्य, जरा चिकित्सा, उपशमन और पुनर्वास सेवायें शामिल होंगी।

प्राथमिक सेवाओं पर दो-तिहाई संसाधन खर्च किये जायेंगे। 2025 तक स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च को बढ़ाकर जीडीपी का 2.25 प्रतिशत किया जायेगा जो अभी जीडीपी का 1.15 प्रतिशत है। इसके साथ ही यह नीति बीमारी के बोझ और मानव संसाधन की उपलब्धता जैसी चुनौतियों का भी हल निकालेगी।

नयी स्वास्थ्य नीति में 15 वर्षों में घटित महामारियों और बीमारियों की प्रकृति के आधार पर बड़े बदलावों पर विचार किया जा रहा है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि में नीति में कुछ बीमारियों जैसे 2017 में काला अजार और 2018 तक कुष्ठ रोग और एक बेहद महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के तहत 2025 तक क्षय रोग के उन्मूलन का लक्ष्य रखा गया है। सरकार 2030 तक घरेलू मरेलिया के प्रसार को खत्म करने पर विचार कर रही है।

भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम, मिशन इंद्रधनुष, लाभार्थियों की संख्या, टीके की गुणवत्ता और टीकाकरण के सत्रों की संख्या, भौगौलिक विस्तार और अलग-अलग क्षेत्रों की कवरेज के आधार पर विश्व के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक है। 2014 में चालू किये गये इस कार्यक्रम का लक्ष्य है कि कोई भी बच्चा, विशेष कर के दुर्गम जिलों में, पूर्ण टीकाकरण के दायरे से छूट ना जाये।

6 टीकों के साथ शुरू हुआ यह अभियान वर्तमान में बच्चों को 11 जानलेवां बीमारियों से बचाता है जिसमें रोटावायरस डायरिया से बचाव का नया टीका, हीमोफिलस इन्फ्लुएन्जा टाइप बी, निमोनिया और मेनिनजाइटिस और न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन शामिल हैं जिन्हें मई में शामिल किया गया है।

कार्यक्रम के आरंभ से अब तक 2.14 करोड़ बच्चो और करीब 5 लाख 60 हजार गर्भवती महिलाओं को टीके लगाये गया हैं। पिछले 2 सालों में नियमित टीकाकरण की दर में 5-7 प्रतिशत सालाना की वृद्धि हुयी है जो कि पिछले एक दशक के दौरान औसत 1 प्रतिशत रही है।

सरकार द्वारा महिलाओं, नवजात शिशुओं और कम आयुवय के बच्चों को पहुंच के दायरे में लाने और सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के लिये राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियान के तहत शुरू किये गये कई नये कार्यक्रमों की वजह से प्रसव केंद्रों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में पिछले दशक में 40.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

इन कार्यक्रमों में शामिल हैं जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई), जिसमें नकद राशि का सीधा अंतरण शामिल हैं, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके), प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जो प्रसव पश्चात सेवा मुहैया कराता है । जेएसएसके कार्यक्रम के तहत किसी भी सरकारी प्रसव केंद्र में जन्म देने वाली प्रत्येक महिला को मुफ्त और कैशलेस स्वास्थ्य सेवा मुहैया करायी जाती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम नवजात शिशुओं को लगातार सेवा उपलब्ध कराने पर जोर देता है।

अस्पतालों में सस्ती दवायें उपलब्ध कराने के लिये सरकार प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना को लागू करने जा रही है। स्वास्थ्य सुरक्षा मुहैया करने के लिये सरकार शीघ्र ही एक कानूनी ढांचा तैयार करेगी जिसके तहत चिकित्सकों को ऐसी नियमित औषधियां लिखनी होंगी जो कि दूसरे ब्रॉण्डेड विकल्पों की तुलना में सस्ती होंगी।

शुरुआत के तौर पर 700 दवाइयों की अधिकतम कीमत तय कर दी गयी है ताकि निर्धन  लोगों को गंभीर बीमारियों से बचने के लिये किफायती दवायें उपलब्ध करायी जा सकें। इसके नियम इस तरह से बनाये गये हैं कि जो दवायें बाजार में 1,200 रुपये में मिलती थीं वे अब 70-80 रुपये में मिल रही हैं। सरकार ने ह्रदय रोगों के उपचार में प्रयोग होने वाले स्टेन्ट की अधिकतम कीमत भी तय कर दी है।

सरकार ने हाल ही में ’एचआईवी का परीक्षण एवं उपचार’ नीति शुरू की है जिसके तहत कोई भी व्यक्ति जो परीक्षण में एचआईवी-एड्स से ग्रस्त पाया जाता है उसे एंटी रिट्रोवायरल उपचार मुहैया कराया जायेगा चाहे उसका सीडी कॉउंट और क्लिनिकल स्टेज कोई भी क्यों ना हो। इससे ऐसे रोगियों की जिंदगी को बढ़ाने और बेहतर बनाने और उन्हें अन्य संक्रमणों से बचाने में मदद मिलेगी विशेषकर क्षयरोग से।

भारत जल्दी ही अगले सात सालों के लिये एचआईवी के लिये राष्ट्रीय रणनीतिक योजना विकसित करेगा जिसकी एड्स के उन्मूलन में अहम भूमिका होगी। एड़्स से जुड़े कलंक और भेदभाव को समाप्त करने के लिये सरकार ने हाल ही में एचआईवी/एड्स कानून पास किया है। यह एक ऐतिहासिक कदम है क्योंकि एचआईवी से ग्रस्त लोगों के अधिकारों की रक्षा का कानून गिने-चुने देशों में ही है।

स्वास्थ्य नीति में बचाव पर जोर दिया गया है कि ताकि इसको अपनाने वाले लोगों को अस्पताल जाने की जरूरत ना पड़े। स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य रोगों से बचाव को बढ़ावा देना है क्योंकि यह बात साबित हो चुकी है कि गंदगी वाले वातावरण में रहने पर रोग ग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है।

सफाई का मतलब वे परिस्थिति और आदते हैं जो स्वास्थ्य को बनाये रखने और बीमारियों की रोकथाम में मदद करती हैं। असुरक्षित पानी, सफाई व्यवस्था और सफाई की कमी से दुनिया में प्रति वर्ष मरने वाले 17 लाख लोगों में 6 लाख भारतीय होते हैं। भारत के लिये अहम स्वच्छ भारत अभियान ने सफाई की कमी से होने वाली मौतों के खिलाफ लड़ाई को मजबूत बनाया है।

सार्वभौमिक सफाई के लक्ष्य को तेजी से हासिल करने के लिये सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान आरंभ किया था। इसका उद्देश्य भारत के शहरों को 2019 तक खुले में शौच से मुक्त बनाना और देश की 4,041 नगर पालिकाओं में कचरे से निपटने के पूर्ण वैज्ञानिक प्रबंधन को लागू करना है। कार्यक्रम का उद्देश्य साफ-सफाई और इसके सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंध के बारे में लोगों को जागरूक बनाना है।

( लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार और स्तंभकार हैं। उपुर्यक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं। आवश्यक नहीं है कि इन विचारों से आईपीएन भी सहमत हो।)

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