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योगी के बजट भाषण में विचार के बिंदु: डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
By Deshwani | Publish Date: 22/7/2017 11:50:03 AM
योगी के बजट भाषण में विचार के बिंदु: डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

विधायी व्यवस्था में बजट का विशेष महत्व होता है। भारतीय संविधान के निर्माता चाहते थे कि व्यवस्थापिका में बजट पर व्यापक चर्चा हो। बहुमत के बल पर इसे आनन-फानन में पारित करने का प्रयास नहीं होना चाहिए। बजट पर ही शासन की समस्त गतिविधियां आधारित होती हैं। इसलिए इसपर विचार विमर्श में जनप्रतिनिधियों की सहभागिता होनी चाहिए। संविधान लागू होने के बाद कई दशक तक यह व्यवस्था सुचारु रुप से चलती रही। संसद में आज भी व्यापक विचार विमर्श की परंपरा कायम है। उत्तर प्रदेश इस मामले में पीछे रह गया। पिछले एक दशक का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। विधानसभा में बजट विधेयक के लिए जितना समय होना चाहिए था, वह नहीं मिल सका। इस दौरान संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर की दुहाई देने वाली पार्टी भी सत्ता में रही। इसमें भी संविधान की भावना का पालन नहीं हुआ। बजट चर्चा पर बहुमत का असर दिखाई देता था। तब सत्ता पक्ष के सदस्य प्रायः बोलने की हिमाकत नहीं करते थे। विधानसभा अध्यक्ष भी चर्चा को बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं लेते थे। कई बार तो हंगामे के बीच बजट को पारित कर दिया गया। इसके बाद जो सरकार बनी उसमें भी स्थिति लगभग ऐसी ही रही। यह सराहनीय है कि इस बार विधानसभा में बजट पर चर्चा के लिए पर्याप्त समय रखा गया। 
विधानसभा अध्यक्ष आज यह कहने की स्थिति में हैं कि उन्होंने संख्याबल के हिसाब से अधिक से अधिक लोगों को बोलने का अवसर दिया। यह नजारा वर्षों बाद देखा गया। वर्षों बाद किसी मुख्यमंत्री ने बजट चर्चा का इतने विस्तार से जवाब दिया। योगी आदित्यनाथ पौने दो घंटे तक बोले। उनके इस भाषण में विचार के कई मुद्दे हैं। इसमें पिछले वर्षों में वित्तीय अनुशासन के अभाव, भ्रष्टाचार की चर्चा के अलावा भविष्य की रणनीति का उल्लेख था। इसमें अंत्योदय, गांव, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर औद्योगीकरण के विषय समाहित थे। 
यह भी सराहनीय था कि मुख्यमंत्री के भाषण के दौरान नेता प्रतिपक्ष को स्पष्टीकरण मांगने का अवसर दिया गया। उन्होंने स्पष्टीकरण मांगने के अलावा अन्य बातों पर जोर दिया। मुख्यमंत्री ने जिम्मेदारी के साथ कहा था कि पिछली सरकारों ने बेरहमी से प्रदेश को लूटा था। नेता प्रतिपक्ष खुद भी पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। वह अपने स्पष्टीकरण में तथ्यों के साथ आरोप नकार सकते थे। उन्होंने ऐसा नहीं किया। वरन् आरोप के बदले आरोप की बात कही। कहा कि वह चार महीनों में प्रदेश को लूटने का आरोप लगायें तो आपको कैसा लगेगा। इसका निहितार्थ यह था कि कोई एक दूसरे पर आरोप ना लगाये। यदि नेता प्रतिपक्ष के पास चार महीनों में ऐसे आरोपों की जानकारी है तो उन्हें अवश्य बताना चाहिए था। नेता प्रतिपक्ष भूल गये कि उनकी सरकार में पूर्ववर्ती बसपा पर घोटालों के लगातार आरोप लगाये जाते थे। खड़े हाथी, बैठी हाथी, पत्थर वाली बुआ जी के तंज से आरोप लगते थे। तब उन्होंने यह नहीं सोचा कि बसपा को कैसा लगेगा।
सवाल किसी को कैसा लगेगा, इसका नहीं है। घोटाले हुए हैं तो आरोप लगेंगे, लगने चाहिये, उनको सुनना भी पड़ेगा। नयी सरकार की यह जिम्मेदारी है कि घोटालों की जांच हो। बेहतर होता कि विपक्ष योगी द्वारा उठाये गये बिन्दुओं का तर्कसंगत जवाब देता। इसके विपरीत पहले तो नेता प्रतिपक्ष अपने स्पष्टीकरण में तर्कसंगत तथ्य नहीं रख सके। इसके बाद बहिष्कार का फैसला हुआ। इसमें सपा, बसपा कांग्रेस ऐसे पाले में थे। यहां सवाल इन सबसे है। मुलायम सिंह यादव सरकार पर घोटालों का आरोप लगाकर बसपा 2007 में सत्तारुढ़ हुई थी। फिर 2012 में उसी तर्ज पर सपा ने बसपा पर आरोप लगाकर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस 27 साल यूपी बेहाल का नारा लगा रही थी। तब उसकी नाराजगी सपा, बसपा दोनों के प्रति थी। योगी ने कोई नयी बात नहीं की। सपा-बसपा एक दूसरे पर घोटाले के आरोप लगाती थी। वही तथ्य योगी सरकार को मिले हैं। योगी के भाषण में इसके अलावा अंत्योदय, गांव, किसान, आदि बिंदु भी है। इन पर भी विचार जा सकता है। इनसे सरकार का मंसूबा झलकता है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं)।
 
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