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राष्ट्रपति चुनाव में जीता ही नहीं, हारा भी यूपी-सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 21/7/2017 10:51:37 AM
राष्ट्रपति चुनाव में जीता ही नहीं, हारा भी यूपी-सियाराम पांडेय ‘शांत’

राष्ट्रपति पूरे देश का होता है। उसे चुनने में देश भर के सांसदों और विधायकों का योगदान होता है। सांसद और विधायक आम जनता द्वारा चुने जाते हैं। भले ही राष्ट्रपति जनता द्वारा सीधे न चुना जाए, उसका चुनाव जनता के चुने हुए प्रतिनिधि करते हों लेकिन वह होता तो पूरे देश का है। वह ‘जस की तस धर दीनी चदरिया’ की रीति-नीति पर अमल करता है। लोकजीवन में शुचिता और पारदर्शिता के भाव को बनाए रखता है। राष्ट्रपति को देश के किसी खास भूखंड का मानना लोकतंत्र की महान अवधारणा के अपमान करने जैसा ही है लेकिन स्थानीयता का अपना प्रभाव तो होता ही है। यूं तो चुनाव के जरिए नया राष्ट्रपति पाकर पूरा देश खुश है लेकिन उत्तर प्रदेश की बात ही और है। खुशी के मारे उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश से भी ज्यादा खुश है कानपुर देहात जिला और सबसे ज्यादा खुश है परौंख गांव। इस खुशी की अपनी वजह भी है कि उसके लाल ने कमाल कर दिया है। राष्ट्रपति चुनाव जीतकर देश का प्रथम नागरिक बनने का गौरव हासिल किया है। 

निरंतर आगे बढ़ने वालों के बारे में बहुधा एक बात कही जाती है कि उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा लेकिन रामनाथ कोविंद इसके अपवाद हैं। उन्होंने अपने गांव का गौरव ही नहीं बढ़ाया, उसे अभिनव ऊंचाई भी दी। उसे महिमामंडित भी किया। यह कहकर कि परौंख का यह कोविंद गरीबों और दलितों का जनप्रतिनिधि बनकर जा रहा है। उन्होंने अपने गांव को महत्व देकर इतना साबित तो किया ही है कि व्यक्ति चाहे जितना ऊंचा क्यों न उठ जाए, उसे अपने अतीत को नहीं भूलना चाहिए। जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है। ‘जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ आज देश इसलिए भी गरीब है कि उसके द्वारा चुने गए नेता अपने अतीत को भूल गए हैं और अपनी महत्वाकांक्षाओं को ही सब कुछ मान बैठे हैं। रामनाथ कोविंद ने अपनी जीत का श्रेय पूरे देश को दिया है। सभी सांसदों और विधायकों को दिया है और साथ ही इस बात का भी संदेश दिया है कि सेवा भाव से किया गया कार्य कभी निष्फल नहीं जाता। राष्ट्रपति चुनाव में भले ही वे प्रणव मुखर्जी का चुनावी रिकाॅर्ड न तोड़ पाए हों लेकिन कई पूर्व राष्ट्रपतियों के मुकाबले उनकी तीत का आंकड़ा ज्यादा तो है ही। उन्होंने साबित कर दिया है कि जो लोग हौसला रखते हैं और देश के साथ पर विश्वास रखते हैं, सबका साथ-सबके विकास की रीति-नीति पर चलते हैं, वे कभी हारते नहीं हैं और अगर कदाचित हारना भी पड़े तो उस हार में भी अपने भविष्य का श्रृंगार-आधार तलाशते हैं। दलितों और आदिवासियों के बीच उन्होंने जिस निष्ठा और लगन से काम किया है, उसी का प्रतिपफलन है आज की उनकी जीत। 

उत्तर प्रदेश के लिए रामनाथ कोविंद की जीत बेहद मायने रखती है लेकिन मीरा कुमार की हार भी उसके लिए कम मायने नहीं रखती। दोनों ने उत्तर प्रदेश से अपना रिश्ता प्रमाणित किया था। एक ने खुद को उत्तर प्रदेश का बेटा कहा था और दूसरी ने बेटी। इतना ही नहीं,मीरा कुमार उत्तर प्रदेश के बिजनौर से सांसद भी रही हैं। इस नाते भी उत्तर प्रदेश से उनके संबंधों को कमतर नहीं आंका जा सकता। इस लिहाज से देखें तो रामनाथ कोविंद की जीत के बाद भी उत्तर प्रदेश संबंधों की जंग हार गया है। पहली बार कोविंद के रूप में देश को राष्ट्रपति देने का गौरव तो उसे हासिल हुआ लेकिन उसे बेटी के साथ नाइंसाफी की मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ रही है। बिहार भी कुछ इसी तरह के द्वंद्व से गुजर रहा है क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव में बिहार की बेटी हारी है। बेटा और बेटी में से जब किसी एक को चुनना होता है तो लोग बेटे को ही चुनते हैं और बेटियां अपना हक पाने से वंचित रह जाती हैं। वैसे तो पूरा देश रामनाथ कोविंद की जीत पर जश्न मना रहा है। उन्हें बधाइयां दे रहा है लेकिन इसे लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार में कुछ खास बात है क्योंकि यहां रिश्ता जीता है और रिश्ता ही हारा है। 

रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद कहा है कि यह बेहद भावुक क्षण है। भावुक क्षण इसलिए भी कि रामनाथ कोविंद ने पहली बार कोई चुनाव जीता है। इससे पूर्व तो वे राज्यसभा में ही रहे हैं। वे 1994 से 2000 तक और उसके बाद 2000 से 2006 तक राज्यसभा सदस्य रहे। 1990 में उन्होंने घाटमपुर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा जरूर था मगर हार गए थे। इसके बाद वे 2007 में यूपी की भोगनीपुर सीट से चुनाव लड़े, मगर वहां भी उन्हें सफलता नहीं मिली। अगस्त 2015 में बिहार के राज्यपाल बनाए गए थे। 1978 में कोविंद ने बतौर वकील अपना करिअर शुरू किया था। 1977 में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निजी सचिव बनाये गये। रामनाथ कोविंद भाजपा दलित मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा सरकार ने उन्हें राज्यपाल तो बनाया लेकिन इसी बहाने वहां की राजनीति में अपने दलित चेहरे को भी प्रोजेक्ट कर दिया था। 

लोकसभा और और राज्यसभा में कुल 776 सांसद हैं। लोकसभा और राज्यसभा से दो-दो सीट खाली हैं। बिहार के सासाराम से भाजपा के सांसद छेदी पासवान के पास वोटिंग का अधिकार नहीं था। इस तरह 771 सांसदों को वोट डालना था, लेकिन 768 सांसदों ने ही वोटिंग की। तृणमूल कांग्रेस के सांसद तापस पाल, बीजू जनता दल के सांसद रामचंद्र हंसदह और पीएमके के सांसद अंबुमणि रामदौस ने वोट नहीं डाले। दोनों सदनों में 99.61प्रतिशत मत पड़े। यह एक तरह से किसी चुनाव में होने वाला रिकाॅर्ड तोड़ मतदान है। देश की 31 विधानसभाओं में 4120 विधायक हैं। इनमें 10 सीट रिक्त चल रही हैं। एक विधायक चुनाव डालने के लिए अयोग्य है। इस तरह, 4,109 विधायकों को वोट डालना था, लेकिन 4,083 ने वोटिंग की। मतलब कुल 99.37प्रतिशत वोट पड़े। भाजपा के लिए यह पहला मौका है जब 37 साल में पहली बार उसका अपना कार्यकर्ता देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होगा। 6 अप्रैल 1980 को भाजपा बनी थी। 1996 में देश में उसकी केंद्र में पहली सरकार बनी। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे। एपीजे अब्दुल कलाम राजग की पसंद के राष्ट्रपति तो थे, लेकिन वे भाजपा से जुड़े नहीं थे। भैरोंसिंह शेखावत भाजपा के थे मगर उप राष्ट्रपति थे। कोविंद के रूप में पहली बार देश का प्रथम नागरिक ऐसा शख्स होगा जो भाजपा से अरसे से जुड़ा हुआ है। रामनेता कोविंद राष्ट्रवादी चेतना से तो जुड़े ही हैं, वे मानवतावादी भी हैं। गरीबों, दलितों, शोषितों और वंचितों के लिए कुछ कर गुजरने की भावना ही उनकी राजनीतिक पूंजी है और इस पूंजी को वे कदाचित खोना नहीं चाहेंगे। इस देश को 20 साल बाद दूसरा दलित राष्ट्रपति चुनने का गौरव मिला है। 1997 में दलित नेता के आर नारायणन देश के प्रथम नागरिक चुने गए थे। दोबारा रामनाथ कोविंद के इस पद पर चयनित होने से देश के दलित, उपेक्षित, वंचित लोग अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उनके हृदय में आनंद का संचार हुआ है और जिस तरह का विश्वास कोविंद ने जताया है कि वे उनके जन प्रतिनिधि बनकर राष्ट्रपति भवन जा रहे हैं, इससे इतना तो तय है कि इस तबके को आगे बढ़ाने, उन्हें विकास की मुख्य धारा में शामिल कराने में उनका योगदान अहम रहेगा। जनप्रतिनिधि किसी जाति, वर्ग, धर्म और दल विशेष का नहीं होता, चुने जाने के बाद वह सबका हो जाता है। प्रणव मुखर्जी के कार्यकाल में उन पर पक्षधरता के एक भी दाग नहीं लगे हैं। उम्मीद की जा सकती है कि नव निर्वाचित राष्ट्रपति कोविंद भी प्रणव मुखर्जी और कलाम की राह पर चलेंगे। उनके लिए देश पहले होगा और पार्टी बाद में। पद से बड़ा होता है, उससे जुड़ा दायित्व। जो दायित्व बोध को समझता है, वह भूमंडल की बात करता है। सीमाओं में नहीं बंधता। कोविंद के साथ भी ऐसा ही होगा, वे बेहद सुलझे और मंझे राष्ट्रपति साबित होंगे, पूरे देश को ऐसा विश्वास है।

( लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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