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ये चुनाव नहीं आसान…..
By Deshwani | Publish Date: 7/1/2017 2:38:23 PM
ये चुनाव नहीं आसान…..

 नई दिल्ली (शुभम कुमार गुप्ता )। नव वर्ष के साथ ही चुनाव आयोग ने भी आचार संहिता वाला बम फोड़ दिया है और अब इसके साथ ही राजनितिक पार्टियों ने भी अपनी पूरी कमर कस ली है, देश की जिन पांच विधानसभाओं के लिए चुनाव की घोषणा हुई है उनमे पांच राज्य हैं- उप्र, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा। अकेले उप्र की कुल सीटों (403) के मुकाबले शेष चार राज्यों की कुल सीटें (287) भी कम हैं। इस दृष्टि से उप्र के चुनाव के नतीजे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार नहीं है लेकिन वहां भाजपा की सरकार 2017 में नहीं बनी तो मान लीजिए कि उस हार का ठीकरा नरेंद्र मोदी के सिर फूटेगा। एक तो इसलिए कि खुद मोदी ने कहा है कि राज्यों के चुनाव यह बताएंगे कि नोटबंदी सही थी या नहीं। और दूसरा, इसलिए कि उप्र में भी बिहार की तरह मोदी ही मोदी है। मोदी के अलावा कोई नहीं है। प्रधानमंत्री भी मोदी और मुख्यमंत्री भी मोदी। हर राज्य में मुकाबला मोदी बनाम अन्य होगा। भाजपा विरोधी पार्टियों ने भी मोदी से मुकाबले की तैयारी की है। भाजपा की चुनावी रणनीति से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले ढाई साल में ब्रांड मोदी मजबूत हुआ है। गोवा में भले भाजपा की सरकार है, लेकिन वहां भी भाजपा का चेहरा नरेंद्र मोदी हैं। पंजाब में भाजपा सिर्फ 23 सीटों पर लड़ती है, लेकिन कैप्टेन अमरिंदर सिंह और अरविंद केजरीवाल दोनों ने मुकाबला नरेंद्र मोदी से बनाया है। जहां भी पार्टियां नोटबंदी का मुद्दा बना रही हैं, वहां पर नरेंद्र मोदी अपने आप मुद्दा बन रहे हैं। भाजपा नेताओं का मानना है कि अगर वे दावेदार पेश करते, तब भी विपक्षी पार्टियों को मोदी से ही लड़ना था। इसलिए दावेदार पेश नहीं करना ज्यादा फायदे का सौदा है। उप्र में भाजपा के पास मुख्यमंत्री के लायक कोई चेहरा ही नहीं है। लखनऊ में हुई जनसभा मोदी के जीवन की सबसे बड़ी सभा थी, ऐसा ढिंढोरा खुद ने पीटा। उस सभा में ‘मोदी-मोदी’ के नारे नदारद थे। उत्साह नाम की चीज़ नहीं थी। यह भी सर्जिकल स्ट्राइक की तरह फर्जीकल स्ट्राइक ही थी। नए-नए सफेद किए गए कालेधन का इससे बढ़िया क्या इस्तेमाल हो सकता था? यदि यादव कुनबा अपनी परंपरा के मुताबिक आपस में लड़ मरा तो उप्र में भगवा लहरा कर ही रहेगा! ऐसे में यादवों को श्रेय मिलेगा, डगमगाते मोदी को जमाने का। इसी तरह उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती के मुकाबले भी नरेंद्र मोदी का चेहरा है।

चंडीगढ़ स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा की जीत नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा नोटबंदी के फैसले का पुरजोर समर्थन है। भाजपा ने कुल 22 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें उसने 20 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि उसके गठबंधन घटक दल शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने एक सीट पर जीत दर्ज की है। भाजपा और एसएडी ने मिलकर कुल 26 में से 21 सीटें जीतीं। इन पांचों राज्यों में भाजपा सरकार न भी बना पाए लेकिन यदि कुल मिलाकर ज्यादातर सीटें उसे मिल गईं तो उसका फायदा उसे राज्यसभा और राष्ट्रपति चुनाव में जरुर मिलेगा। यदि विधानसभाओं में सीटें घट गईं तो मोदी अपने ‘मन की बात’ न तो राष्ट्रपति के चुनाव में चला पाएंगे और न ही एकरुप कराधान (जीएसटी) आदि मामलों में कोई खास प्रगति होगी।
दूसरे शब्दों में ये प्रादेशिक चुनाव या तो थके हुए मोदी के पांव में जान डाल देंगे या फिर इस सरकार के घुटने तोड़कर रख देंगे। ढाई साल बंडियां बदल-बदलकर बंडल मारने में गुजार दिए और अब शेष ढाई साल यदि आराम से काटने हैं तो भाजपा को किसी भी तरह उप्र और एक-दो विधानसभाएं जीतनी होंगी। साम, दाम, दंड, भेद-सभी तरीकें अपनाने होंगे। इस बार के ये चुनाव तो राज्यों के चुनाव हैं लेकिन इनका असर राष्ट्रीय चुनाव-जैसा ही होने वाला है। ये चुनाव ही तय करेंगे कि 2019 में भाजपा केंद्र में लौटेगी या नहीं? साथ-साथ यह विधानसभा चुनाव अपने पिता से बगावत कर रहे अखिलेश यादव के लिए भी काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जिस तरह से वह अपनी राजनितिक परिपक्वता दिखा रहे हैं यह उनके लिए 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के भविष्य को बयान करेगी तो दूसरी तरफ यह चुनाव मायावती के लिए भी काफी महत्वपूर्ण होगा और ओनके पार्टी के भविष्य को भी बतायेगा क्योंकि जिस तरह से 2014 के लोकसभा चुनाव में उनका वोट प्रतिशत कम हुआ है और इस बार भी अगर वह चुनाव हारती हैं तो सरकार से बाहर होने का समय 10 साल हो जाएगा और आगे चलकर उनके लिए राजनीती काफी कठिन भी शाबित हो सकती हैं तो वही पिछले कई शासनकाल से यूपी से बाहर चल रही कांग्रेस और राहुल गाँधी के राजनितिक करियर पे सवाल उठने अब और लाजमी और तेज हो जाएंगे।
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