संपादकीय
विकास पागल नहीं होता, पागल होते हैं नेता : सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 11/10/2017 1:53:24 PM
विकास पागल नहीं होता, पागल होते हैं नेता : सियाराम पांडेय ‘शांत’

विकास का जितना मानवीकरण भारत में हुआ है, उतना शायद ही दुनिया के किसी देश में हुआ है। विकास को लेकर बेहद सीधा और सरल सवाल है। विकास हुआ है या नहीं। विकास दिख रहा है या नहीं दिख रहा है। इन्हीं दो सवालों की बिना सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों की कार्यशैली का आकलन होता है। दुनिया के किसी भी देश में विकास को मापने का और कोई नपना नहीं है। वह तो भारत ही है जहां विकास थक जाता है। पगला जाता है। विकास को बेहद वस्तुनिष्ठ तरीके से ही देखना चाहिए। विकास न तो थकता है और न ही पागल होता है। पागल होता है विकास को करने वाला या विकास को देखने वाला और इसके अपने कारण होते हैं। अपने स्वार्थ होते हैं। भारत में विकास का एक ही आधार है और वह है राजनीतिक। जब तक देश, प्रदेश और समाज का विकास करने से पहले जातियों और मजहबों के समीकरण देखे जाएंगे, विकास में पुरुषों और महिलाओं के चेहरे देखे जाएंगे, जब तक विकास को लेकर वोट की राजनीति होगी, तब तक यह देश सही मायने में विकसित हो ही नहीं सकता।

बड़ोदरा की एक सभा में राहुल गांधी ने दो सवाल किए हैं और ये दोनों ही सवाल बेहद विस्मयकारी हैं। क्या संघ में किसी ने महिलाओं को शाट्र्स में देखा है और दूसरा सवाल कम, तंज ज्यादा है कि भारत में झूठ सुन-सुनकर अब तो विकास भी पागल हो गया है। ये दोनों ही सवाल राहुल गांधी की अपरिपक्व मानसिकता का इजहार करते हैं। ऐसा नेता जिसके हाथ में देश के सबसे बड़े और पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस की बागडोर सौंपी जानी है, अगर वह इस तरह के सवाल करें तो उनकी सोच और समझ पर तरस तो आता ही है। बताना मुनासिब होगा कि उनके विकास संबंधी सवालों पर राहुल गांधी को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उनके अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में ही घेरा है। सरकार के तीन साल का हिसाब मांगने वाले राहुल गांधी से अमेठी की जनता तीन पीढ़ी का हिसाब मांग रही है। उन्होंने जानना चाहा है कि अमेठी में एफएम रेडियो स्टेशन क्यों नहीं बना। जिलाधिकारी का कार्यालय क्यों नहीं बना। टीवी यूनिट क्यों नहीं खुली। 24 घंटे बिजली क्यों नहीं आती। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव जीतने के बाद वे अमेठी क्यों नहीं आते। उनसे अच्छी तो स्मृति ईरानी है जो यहां से चुनाव हारने के बाद भी यहां की जनता से मिलने आती हैं। उनकी समस्याएं जानती हैं और उनके समाधान का प्रयास करती हैं। अमित शाह ने कहा कि देश में दो तरह के विकास मॉडल हैं। एक गांधी-नेहरु परिवार का विकास मॉडल और दूसरा नरेंद्र मोदी का विकास मॉडल। नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल को उन्होंने सबसे बेहतर ठहराया।

गुजरात के विकास का मखौल उड़ा रहे राहुल गांधी से उन्होंने उन्हीं के संसदीय क्षेत्र में सीधा सवाल किया कि अमेठी का उन्होंने कैसा बंटाधार किया है। 70 साल तक कांग्रेस सत्तासीन रही, उसने क्या किया। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने विकास के लिए क्या किया और अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को विकसित करने का बीड़ा उठाया है तो कांग्रेस में छटपटाहट क्यों है? गुजरात की जनता जानती है कि विकास क्या होता है। राहुल तो केवल अपनी अमेठी को ही बता दें कि यहां उन्होंने क्या विकास किया है। जब कांग्रेस सरकार थी तो उत्तर प्रदेश को 2 लाख 80 हजार करोड़ मिलता था। आज केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश को 7 लाख करोड़ से ज्यादा पैसा दे रही है। मोदी सरकार ने 3 साल में गरीब, किसान, दलितों, महिलाओं, आदिवासियों और युवाओं के लिए 106 योजनाएं शुरू की हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी को 106 तक की गिनती भी नहीं आती। राहुल भक्त सवाल उठा सकते हैं कि क्या अत्यधिक पैसा देना ही विकास की गारंटी है। क्या विकास योजनाओं के बन जाने भर से देश विकसित हो जाता है। मूल सवाल व्यवस्था में सुधार का है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही को इस मोर्चे पर लगना होगा। आत्मसुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है और जो आत्म सुधार करता है, उसके हर सवाल अपने से होते हैं। वह दूसरों से सवाल नहीं पूछता। इस देश का दुर्भाय यह है कि यहां सवाल पूछने वालों की तादाद ज्यादा है। काम करने वाले बस अंगुलियों पर गिनने भर है। इस प्रवृत्ति में बदलाव आए तो बात बने। 

भाजपा के विकास पर तंज कसते-कसते राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर निशाना साध दिया। वडोदरा में छात्रों से उन्होंने कहा कि आरएसएस में महिलाएं नहीं होतीं। क्या आपने आरएसएस में शॉर्ट्स पहने महिलाओं को देखा है। राहुल गांधी के इस सवाल पर कांग्रेस असहज स्थिति में आ गई है। गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने तो यहां तक कह दिया है कि कांग्रेस का संस्कार ही महिलाओं को कम कपड़े में देखने का है। उत्तर प्रदेश के मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा है कि राहुल गांधी डायपर से बाहर नहीं निकलना चाहते। वे अपने बालकपन से ऊपर नहीं उठ पा रहे। जाहिर तौर पर यह प्रतिक्रिया पूरी कांग्रेस को आहत करने वाली है। 

संघ प्रवक्ता राजीव तुली प्रदत्त जानकारी कि संघ में राष्ट्रीय स्वयंसेविका महिलाओं का अलग संगठन है, राहुल गांधी के सामान्य ज्ञान पर सवाल खड़ा करती है। वे जिसकी आलोचना करते हैं, उसका सामान्य इतिवृत्त भी नहीं जानते, इससे अधिक उपहासास्पद स्थिति और क्या हो सकती है? राजीव तुली ने तो यहां तक कह दिया कि जब तक कांग्रेस में राहुल सरीखी सोच के लोग हैं तब तक विपक्ष की राह हमेशा आसान रहेगी। हाल ही में कांग्रेस के बड़े नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि जब तक कांग्रेस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी का वर्चस्व है तब तक किसी भी कांग्रेसी का भला नहीं हो सकता। इसके बाद वे यह कहना भी नहीं भूले कि वे कांग्रेस के अनुशासित सिपाही हैं, कांग्रेस जो भी काम देगी, करेंगे। जो भी दायित्व सौपेेंगी, उसका निर्वहन करेंगे। मतलब साफ है कि राहुल और सोनिया गांधी को लेकर कांग्रेस में भी ही सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। उनकी नीति और नियत पर सवाल उठ रहे हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें लेकर आम धारणा क्या बन रही होगी, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।

 

विकास का सीधा-सादा फंडा यह है कि रोटी-कपड़ा और मकान, साथ-साथ नैतिक उत्थान। नैतिक उत्थान के मामले में देश कहां खड़ा है, यह किसी से पूछने की जरूरत नहीं है। और देश में सभी को रोटी मिल रही है, यह दावा करने की हिम्मत किसी राजनीतिक दल में नहीं है। आवासीय समस्या को सुलझाने की दिशा में मोदी सरकार गंभीर है। सबको रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में काम हो रहे हैं। उम्मीद की जा सकती है कि हाल के कुछ वर्षों में रोटी-कपड़ा और मकान की जरूरतें पूरी हो जाएंगी। देश के कुछ शहर बेहद स्मार्ट हो जाएंगे लेकिन यह सब तब तक संभव होगा जब तक विपक्ष विकास की राह में अपने वोटों का संतुलन देखता रहेगा। राजनीतिक वर्ग की ओर से एक जुमला बहुत तेजी से उछल रहा है कि वे लूटने-खाने नहीं, काम करने आए हैं। इस तरह के जुमले कहीं न कहीं, द्वेष भाव को ही जन्म देते हैं। यह देश प्रेम का है। स्नेह-सौजन्य और सहकार ही इसकी अंदरूनी दौलत और ताकत रही है। जो लोग देश की आर्थिक आजादी की बात करते हैं, उन्हें देश के विकास के वैदिक सूत्र को अपनाना होगा जिसमें साथ-साथ चलने, भोजन करने और बोलने की बात कही गई है। साथ साथ मनन-चिंतन करने की बात कही गई है। क्या इस देश की घड़ी चिंतन के उस पुरायुग की ओर घूम नहीं सकती? 

 

एक दूसरे की आलोचना तो ठीक है लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। देश केवल विकास चाहता है। यह कौन कर रहा है, यह सोचना जनता का काम है। नेता तो बस विकास करें। मूल्यांकन का काम जनता पर छोड़ दें। किसी को हिसाब पूछने या देने की जरूरत नहीं होगी। जनता को यह बताने की भी जरूरत नहीं होगी। देश विकसित होगा तो उससे देशवासी ही नहीं, नेताओं के चेहरों की भी चमक बढ़ेगी? एक दूसरे की आलोचना की बजाय केवल विकास को साधने की बात होती। हर हाथ को काम देने की बात होती। राजा भोज की तरह यह जानने के प्रयास होते कि किस घर में चूल्हा नहीं जला। हर घर में चूल्हा जलना सुनिश्चित हो। कानून का राज्य स्थापित हो। इस दिशा में प्रयास की जरूरत होगी। जब तक देश में नैतिक होने का साहस नहीं होगा, वह आत्मनिर्भर नहीं सकता। सरकार से मदद न लेनी पड़े, यह जन भाव और देश का एक भी व्यक्ति असुविधा भरा जीवन न जीए,यह सरकारी भाव जब तक विकसित नहीं होगा, तब तक कैसा विकास और किसका विकास। 

 

अगर देश का एक भी व्यक्ति गरीब है तो इसका मतलब वह विकास से दूर है। अच्छा तो यह होता कि विकास पर राजनीति न होती। विकास में सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी कोशिश करते। हर दल के सांसद, विधायक और नेता अपने संपर्क क्षेत्र के एक गांव को गोद लेते। प्रधानमंत्री की पहल पर कुछ ने ऐसा किया भी है। उसी गांव को विकसित बनाते। वहां स्कूल, अस्पताल खोलते। देखते- देखते सारा देश विकसित हो जाता। नेताओं को देश को यह तो बताना ही चाहिए कि वे देश का विकास चाहते हैं या उसका वोट। वोट का दूसरा नाम समर्थन है और समर्थन उसे ही मिलता है जो काम का हो। इस सामान्य बात को राजनीति करने वाले नहीं समझते, यह कैसे कहा जा सकता है? किसने विकास किया है और कितना किया है? कितना अपना विकास किया है और कितना जनता का, यह किसी से छिपा नहीं है? इस द्वंद्व में फंसे बगैर देश के समस्त राजनीतिक दलों से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे केवल अपने क्षेत्र का विकास करें। बाकी कुछ नहीं भी करेंगे तो भी चलेगा। 

(लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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