संपादकीय
चीन के बहाने राहुल का मोदी पर निशाना : सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 7/10/2017 3:57:57 PM
चीन के बहाने राहुल का मोदी पर निशाना : सियाराम पांडेय ‘शांत’

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का चीन प्रेम किसी से छिपा नहीं है। वे भारत का मुकाबला चीन से बताते हैं। यह अलग बात है कि जब तक भारत में कांग्रेस सरकार रही, उन्हें कभी चीन याद नहीं आया। चीन अपनी रौ में धमकाता रहा और केंद्र में बनी कांग्रेस सरकार चुप्पी साधे रही। उसकी बकार भी नहीं फूटी। अगर उसने चीन से आंख मिलाने का भी साहस किया होता तो चीन की हिम्मत कब की टूट चुकी होती। चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुसकर भारतीय पहाड़ियों पर चीन लिखने और वहां अपना झंडा टांगकर जाने की हिमाकत नहीं करते लेकिन कभी किसी कांग्रेसी नेता ने इसका प्रतिकार किया हो, ऐसा देखने-सुनने में नहीं आया। वह कांग्रेस ही थी जिसके शासन में चीन ने भारत के बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा किया था लेकिन कांग्रेस ने कभी उस भूमि को चीन से छुड़ाने की कोशिश नहीं की। वह कांग्रेस ही थी जिसके शासन काल में पाकिस्तान ने अपने हिस्से वाले कश्मीर की जमीन चीन को दे दी थी, उसका भी कांग्रेस ने कोई प्रतिवाद नहीं किया था।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत के दो रूप देखने को मिले। पहला यह कि वह अपने अतिथि को सम्मान देने में कभी कमी नहीं बरतता। यह भारतीय परंपरा है कि अतिथि भगवान का रूप है। अगर नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत में पलक पावड़े बिछाए तो यह भारतीय गौरव गरिमा और परंपरा के ही अनुरूप था लेकिन उसी दौरान भारतीय सैनिकों ने लेह-लद्दाख में घुसपैठ कर चुके चीन के सैनिकों को अपना तम्बू अपने हाथ से उखाड़ ले जाने को विवश भी किया। राहुल गांधी को लगता है कि इस देश के एक साथ भाला और माला रखने का दर्शन समझ में नहीं आया है। डोकलाम में चीनी सैनिकों की आंख में आंख डालकर हमारे सैनिक सीमा पर अड़े रहे। उस समय तो राहुल गांधी चीन के राजदूत से गुपचुप वार्ता कर देश को कमजोर करने का षड्यंत्र रचते रहे। यह मैं नहीं कह रहा, सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से उन पर इस तरह के आक्षेप भी लगे। नरेंद्र मोदी की आलोचना करना तो समझ में आता है कि लेकिन देश का मनोबल तोड़ना कहां तक उचित है? अब जब एक बार फिर चीन डोकलाम से दस किलोमीटर दूर कथित तौर पर सड़क निर्माण कराना चाहता है तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 56 इंच का सीना देख रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू और राजीव गांधी ने चीन द्वारा बलात हड़पी गई भूमि को चीन के कब्जे से छुड़ाने के लिए क्या किया? राहुल गांधी को इस देश को यह तो बताना ही चाहिए कि वे देश के साथ हैं या चीन के। डोकलाम मुद्दे पर चीन से विवाद खत्म होने के उनके दावे पर सवाल उठा रहे हैं। कपिल सिब्बल सवाल पूछते नजर आ रहे हैं कि अब क्या करेंगे मोदी। क्या वे फिर शी जिनपिंग को बुलाकर झूला झुलाएंगे? इस तरह के सवाल पूरे देश को परेशान करने वाले हैं। सवाल उठता है कि कांग्रेस ने साठ साल से अधिक समय तक इस देश पर राज किया लेकिन उसने चीन और भारत के बीच संबंधों को सुधारने की दिशा में क्या किया? चीन के उत्पादों को भारत में प्रोत्साहित करने का काम कांग्रेस ने ही किया। इसका नतीजा क्या हुआ? भारत के अपने कुटीर उद्योग मर गए।

इसमें संदेह नहीं कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आंकड़ों के खेल में हाथ आजमा रहे हैं। यह जानते हुए भी कि आंकड़े सबसे नहीं सधते। आंकड़ों की बाजीगरी कभी-कभी खुद पर भारी पड़ जाती है। इसीलिए राजनीति के चतुर-सुजान आंकड़ों से खुद तो बचते ही हैं, अपने समर्थकों को भी इस पंक में गोता लगाने से मना करते हैं। राहुल को इन दिनों भारत का नहीं, चीन का विकास नजर आ रहा है। जब उनकी सरकार थी तो उन्हें लगता था कि पूरा देश खुशहाल था। सत्ता का अहंकार शासक को सच देखने नहीं देता। कांग्रेस इसकी अपवाद नहीं हो सकती थी। उसकी आंखों पर राजमद का पर्दा पड़ा था और जब जनता ने उसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया है तो उसे मोदी सरकार की सच्ची और अच्छी बात भी कड़वी और नुकसानदेह प्रतीत होती है। राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी के दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इस समय देश हर मोर्चे पर गंभीर संकट में है, ऐसे में मोदी उनका ध्यान हटाने के लिए लोगों को भयाक्रांत कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समस्याओं पर फोकस करें। लोगों को पैनिक करना छोड़ दें। उन्हें देश में केवल दो समस्याएं ही नजर आ रही हैं। एक किसान और दूसरा नौजवान। किसान कभी समस्या नहीं रहा और नौजवान भी कभी समस्या नहीं रहा। लेकिन राहुल गांधी की सोच की बलिहारी यह है कि वह किसान और नौजवान दोनों ही को देश की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या मान रहे हैं। उनका आशय किसानों की समस्या और बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे से है। उनका मानना है कि इन दोनों मुद्दों पर नरेंद्र मोदी को बहाना नहीं बनाना चाहिए। कुछ करके दिखाना चाहिए। वे इसमें यह भी जोड़ते हैं कि मोदी पहले ऐसा करें फिर देशवासियों को नए सपने दिखाएं। अब राहुल गांधी को यह कौन समझाए कि जो देश सपने नहीं देखता, वह तरक्की नहीं देखता। साठ साल के पूर्ववर्ती कांग्रेस राज में इस देश ने सपने देखना छोड़ दिया। लोगों का सरकार पर से विश्वास उठ गया था। मोदी में उन्हें एक आशा की किरण नजर आई है। अपना सपना साकार होता नजर आया है। नरेंद्र मोदी इस देश की सवा अरब से अधिक आबादी की अपेक्षाओं के बोझ से दबे हैं। वे उसे पूरा करने की कोशिश से दबे हैं। युवाओं का आत्म बल जगाना है। उन्हें केवल यह बताना है कि ‘का चुप साध रहा बलवाना।’ मोदी अपने इस प्रयास में सफल हो रहे हैं। राहुल गांधी सरीखे नेताओं को मोदी से ज्यादा, उनके द्वारा दिखाए जाने वाले सपनों से डर लगता है। देश में राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना जागृत हो रही है। यह भाव कांग्रेस को रास नहीं आ रहा है। 

राहुल गांधी कहते हैं कि विकास के मामले में भारत का मुकाबला चीन से है। वहां रोज 50 हजार युवाओं को रोजगार मिल रहा है और हमारे यहां सिर्फ 450 युवा किसी तरह से रोजगार पा रहे हैं। भारत में रोज 30 हजार युवा रोजगार पाने की जुगत में बाजार में आते हैं। उन्होंने यह नहीं बताया कि बाजार में उन्हें काम मिलता है या नहीं। यह स्थिति कब से है। यह भी नहीं बताया। अगर कांग्रेस ने वाकई बेरोजगारी मिटाने की दिशा में काम किया होता तो आज देश में हर हाथ में काम होता लेकिन कांग्रेस ने जय जवान-जय किसान का नारा तो दिया लेकिन किसानों और जवानों दोनों ही की समस्याओं के समाधान की दिशा में कभी गंभीरता नहीं दिखाई। भारत में प्रतिदिन रोजगार पाने का यह आंकड़ा राहुल गांधी को कहां से मिला, यह तो वही बता सकते हैं लेकिन लगे हाथ अगर वे यह भी बताते कि नेहरू जी के, राहुल गांधी के, इंदिरा जी के, पीवी नरसिम्ह राव जी के और मनमोहन जी के कार्यकाल में युवाओं को कितनी नौकरियां दी गईं और उस दौर में कितने युवा बेरोजगार थे। देश में कुटीर उद्योगों के क्या हालात थे। बड़ी कंपनियों को कुटीर उद्योगों के तहत बनने वाले उत्पादों के निर्माण का लाइसेंस किसने दिया। गांव और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कांग्रेस का योगदान क्या रहा। कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि चीन भी लगभग भारत के साथ ही आजाद हुआ था। वह इतनी तरक्की कर गया। उसने भारत से युद्ध लड़कर उसकी जमीन भी हथिया ली। उसके बाजार पर भी कब्जा कर लिया और भारत क्या करता रहा? नरेंद्र मोदी की सरकार में भारत चीन को झटका तो दे रहा है। अगर वाकई चीन में रोजगार की यह स्थिति मजबूत है तो वहां गरीबी और बदहाली क्यों हैं? क्या इसका जवाब राहुल गांधी देना पसंद करेंगे? 

आर्थिक मोर्चे की बात करें तो वर्ष 1980 में चीन और भारत लगभग एक जगह पर खड़े थे। आज स्थिति यह है कि चीन से हमें खरबों रुपये का व्यापार घाटा हो रहा है। एक तरफ चीन के साथ सुरक्षा खतरे और दूसरी तरफ उसे आर्थिक फायदा, यह बड़ी पेचीदगी भरी स्थिति है। हालांकि यह अच्छी बात है कि वह ऊर्जा क्षेत्र में ज्यादा घुसपैठ नहीं कर पाया और जन जागरूकता के कारण भारत के व्यापार घाटे में कमी आ रही है। इस स्थिति के लिए निश्चित रूप से केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकारें ही जिम्मेदार रही हैं। 190 देशों के साथ भारत का व्यापार है। विश्वभर से 120 बिलियन डॉलर व्यापार घाटे में अकेले चीन से 52.8 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा हो रहा है। विश्वभर के व्यापार में 26 फीसदी क्रूड ऑयल का है। चीन के साथ इससे कोई लेना-देना नहीं है। इस हिसाब से चीन से हमें करीब 62 फीसदी व्यापार घाटा हो रहा है। इससे भारत के 50 लाख कामगार बेकार हुए हैं। अकेले पानीपत की हैंडलूम इंडस्ट्री में चीनी सामान के कारण पिछले 16 साल में लगभग 2 लाख मजदूर बेकार हुए हैं। इसे रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? किसानों के ऋण माफ कर देने भर से उनकी समस्या का समाधान नहीं होने वाला। उनकी समस्या का समाधान तो तभी संभव है जब उनकी आय का जरिया बढ़े। अगर किसानों की मांग के अनुरूप कांग्रेस ने कृषि को उद्योग का जरिया घोषित कर दिया होता तो भारत का किसान आज सरकारी कृपा का मोहताज नहीं होता। गांवों में चल रहे पुश्तैनी धंधों को चौपट करने का काम भी कांग्रेस के ही दौर में हुआ और इसका लाभ उठाया पूंजीपतियों ने। नरेंद्र मोदी पर पूंजीपतियों के लिए काम करने का आरोप लगाने से पूर्व राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस को अपनी गिरेबान में भी झांकना चाहिए। व्यवस्था में सुधार एक झटके में नहीं हो जाता। उसमें समय लगता है। कम से कम मोदी सरकार में ‘खाता न बही, जवन केसरी कहै वही सही’ वाली बात तो नहीं है। हर काम साफगोई से हो रहा है। दीपक बुझने से पहले जोर से भभकता है। देश में जो समस्याएं दिख रही हैं, उनके अवसान का सिलसिला आरंभ हो गया है। उनकी जड़ पर प्रहार हो रहा है। विपक्ष अगर आलोचना से पूर्व थोड़ा और इंतजार करता तो शायद उसे देश में हास्यास्पद स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। 

(लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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