संपादकीय
गुमान नहीं, अखिलेश के काम से ही बढ़ सकती है सपाः सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 6/10/2017 2:49:02 PM
गुमान नहीं, अखिलेश के काम से ही बढ़ सकती है सपाः सियाराम पांडेय ‘शांत’

दस और पांच का संयोग समाजवादी पार्टी के लिए बेहद खास है। पांच अक्टूबर यानी अंग्रेजी कैलेंडर की 5 तारीख, दसवां महीना। ठीक दस माह बाद अखिलेश यादव को दोबारा सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है। वह भी निर्विरोध। इससे पहले एक जनवरी, 2017 को अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था। सपा के महासचिव राम गोपाल यादव द्वारा आहूत उक्त सम्मेलन में मुलायम सिंह यादव को पार्टी का संरक्षक बनाया गया था। इस बार कुल 15 हजार प्रतिनिधि अखिलेश यादव की सुल्तानी के गवाह बने हैं। 15 माह से देश के सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे में कलह की बयार बह रही है। दस पांच का योग पंद्रह होता है। चार नवंबर 1992 को समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई थी और ढाई दशक तक पार्टी की कमान निरापद ढंग से जिस मुलायम सिंह यादव के हाथ में रहीं, उन्हें राजनीतिक नेपथ्य में डालकर, उनके राजनीतिक अनुभवों को दरकिनार कर क्या पार्टी को राष्ट्रीय बनाया जा सकता है? क्या घरेलू उठापटक खत्म हुए बिना सपा राजनीति की पिच पर सरपट दौड़ लगा सकती है? यह कुछ ऐसे सवाल हैं, जो राजनीतिक विश्लेषकों को सोच-विचार करने के लिए बाध्य करते हैं। 

समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव तो पार्टी की कमान तो सौंपी ही, भाजपा को चुनौती भी दी कि सपा ही एक मात्र ऐसा राजनीतिक दल है जो भाजपा के विजय रथ को रोक सकता है। अखिलेश यादव ने तो यहां तक कह डाला कि वे जल्द ही सपा को राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित कर देंगे। उसे भाजपा से भी बड़ी पार्टी बना देंगे तो क्या इसका मतलब यह है कि अन्य प्रदेशों में सक्रिय क्षेत्रीय दल सपा से कमतर हैं? क्या सपा अन्य राज्यों में भी अपना विस्तार करेगी और कदाचित वह ऐसा करती भी है तो क्या उसे उत्तर प्रदेश जैसी जमीन मिल पाएगी? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिस पर अखिलेश, आजम और रामगोपाल को संयुक्त रूप से सोचना चाहिए। केवल यादव-मुस्लिम समीकरण ही पर्याप्त नहीं है। भाजपा को रोकने के लिए सबको साथ लेकर चलना होगा और सपा की पूर्व की जातिगत राजनीति की जो छवि रही है, उस पर सहजता से कोई भी विश्वास नहीं करेगा। संस्कार दोष वैसे भी मिटता नहीं है।
 
आजम खान ने आगरा सम्मेलन में जमकर मुस्लिम कार्ड खेला। यह कहने में एक क्षण भी नहीं गंवाया कि भाजपा और संघ के पास देश की सभी समस्याओं का समाधान है, बस मुस्लिमों की समस्याओं का समाधान नहीं है। ऐसा कहकर जाहिर तौर पर उन्होंने भाजपा के ‘सबका साथ-सबका विकास’ की अवधारणा पर चोट किया। वे यहीं नहीं रुके,उन्होंने नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ को बड़ा बादशाह और छोटा बादशाह कहकर भी तंज कसा। नरेंद्र मोदी को तो वे झूठा बादशाह तक कह गए। इस बार आपत्तिजनक बयान देने में उन्होंने सारी मर्यादाएं पार कर दीं। उन्होंने प्रधानमंत्री को खुली चुनौती दी कि मुसलमानों से वोट का अधिकार छीन लो। उसी दिन सत्ता छिन जाएगी। उन पर मनी प्रीत के चलते देश को नरक में पहुंचाने का आरोप भी लगाया। रही बात अखिलेश यादव की तो वे अभी युवा हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनकी पीठ थपथपा चुके हैं लेकिन परिवार के अपेक्षित सहयोग के बिना वे क्या कुछ खास कर पाएंगे, कहा नहीं जा सकता। 
 
इसमें शक नहीं कि अखिलेश यादव का कद बढ़ने के साथ ही आगरा ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश का राजनीतिक ताप भी बढ़ गया है। अखिलेश यादव के सिर पर यह चुनौतियों भरा ताज है। भाजपा के बढ़ते हुए कदम को रोक पाना अखिलेश यादव के लिए बहुत आसान नहीं है और पारिवारिक मतभेद के बीच तो बिल्कुल भी नहीं। कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए भले ही उन्होंने यह कह दिया हो कि अब तो उन्हें पिता और चाचा दोनों का आशीर्वाद मिल गया है लेकिन अंदर का सच उनसे बेहतर भला कौन जानता है? वे 28 सितंबर को ही मुलायम सिंह यादव को न्यौता दे आए थे लेकिन पुत्र प्रेम पर एक बार फिर भाई का प्रेम भारी पड़ा। मुलायम सिंह यादव ने आगरा चलने के लिए शिवपाल को मनाया भी लेकिन जब वे नहीं माने तो वे भी नहीं गए। शुभ कामना संदेश पहुंच गया। इससे इतना तो साफ है ही कि मुलायम परिवार में जमी कलह की बर्फ अभी पिघली नहीं है। 
अखिलेश यादव एक दिन पहले ही पत्नी के साथ आगरा पहुंच गए थे और उन्होंने तो पत्रकारों से यहां तक कहा कि मैंने नेताजी से आशीर्वाद मांगा है, मैं चाहता हूं कि आगरा आएं। उनकी चाहत पूरी नहीं हो सकी। अखिलेश यादव ने आगरा में लगे पोस्टर-बैनर भी देख लिए होते तो उन्हें अपनी चाहत बताने-जताने की हिम्मत न होती। पोस्टर बैनर में तो मुलायम सिंह यादव और शिवपाल दोनों गायब थे। क्या मुलायम सिंह यादव के चहेतों ने उन्हें यह नहीं बताया होगा कि आगरा में उन्हें कितनी तवज्जो मिली है। मुलायम राजनीति के मंझे हुए नेता हैं। वे इतना तो समझते ही हैं कि उनके बेटे के दिल में उनके लिए कितनी जगह है। अखिलेश यादव के साथ किरनमय नंदा, रामगोपाल यादव, आजम खान और कहीं-कहीं धर्मेंद्र याद की तस्वीर छप सकती है तो मुलायम सिंह यादव की क्यों नहीं। सपा के राजनीतिक इतिहास में तो ऐसा पहली बार हुआ है। जब मुलायम सिंह यादव का एक भी चित्र नजर न आए तो क्या इसका मतलब यह समझा जाना चाहिए कि सपा अब मुलायम सिंह यादव को अपना संरक्षक भी नहीं मानती। वैसे भी राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह दिखता नहीं। 
पार्टी में अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध शिवपाल यादव ने तो लोहिया ट्रस्ट से भी अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी है। मुलायम सिंह उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाना चाहते हैं और उन्हें दिल्ली का काम सौंपना चाहते हैं लेकिन उनका यह फार्मूला अखिलेश और रामगोपाल खेमे को रास आएगा, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। शिवपाल यादव ने भी मुलायम सिंह यादव के इस प्रस्ताव पर अपनी असहमति जारी कर दी है। इन सबके बीच भी अखिलेश की राजनीतिक चाहत और दमखम को सलाम करने का मन करता है कि वे सपा को और आगे ले जाना चाहते हैं। उसे भाजपा को रोकने योग्य पार्टी बनाना चाहते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि वे ऐसा किस तरह कर पाएंगे? भाजपा के विजय रथ को रोकना है तो सपा को मजबूत होना होगा और यह तभी संभव है जब मुलायम परिवार एकजुट हो। इटावा में गांधी जयंती पर सपा ने जो रैली निकाली थी, उसमें शिवपाल की अनुपस्थिति यह तो बताती ही है कि वे अपनी उपेक्षा से किस कदर आहत हैं। पिछले 7 साल से वे लगातार इस रैली में बिला नागा शामिल होते रहे हैं। उनकी नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी है कि 25 सितंबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुलायम सिंह यादव ने उनकी इच्छा का सम्मान नहीं किया था। समाजवादी पार्टी से अलग नई पार्टी के गठन का ऐलान नहीं किया था। उन्होंने पत्रकार वार्ता में नई पार्टी बनाने वाले प्रेस नोट को पढ़ा ही नहीं। उस समय इसे मुलायम के पुत्र मोह के रूप में देखा गया था।
समाजवादी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए निश्चित रूप से अखिलेश को पांच साल मिल गए हैं। इन पांच सालों में उन्हें सपा को मजबूत भी करना है और भाजपा को कमजोर भी। उत्तर प्रदेश में भाजपा जितनी मजबूत होगी, सपा उतनी ही कमजोर होगी। वे राहुल गांधी को अपना दोस्त तो मानते हैं लेकिन गठबंधन के मुद्दे पर कन्नी भी काटते हैं। उन्हें गुमान है कि देश में सपा ही भारतीय जनता पार्टी से मोर्चा ले सकती है। भावी चुनाव में ज्यादा सीटें लाने की बात कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में भी अभी समय है। सत्ताश्रय से वंचित पार्टी जनों के अन्यत्र पलायन को रोक पाना क्या उनके लिए बहुत आसान होगा। उनकी पहली चुनौती तो नगर निगम और निकाय चुनाव जीतने की है। इस चुनाव की सफलता पर ही कार्यकर्ताओं के बीच अखिलेश की जनस्वीकृति का संदेश जाना है। 
नोटबंदी और जीएसटी पर भले ही वे भाजपा पर निशाना साध रहे हों और भविष्य में कोई बड़ी रैली करने का आश्वासन दे रहे हों लेकिन जब तक वे अपने घर को मजबूत नहीं करेंगे तब तक वे सपा के लिए मील का पत्थर नहीं बन पाएंगे। उनका आरोप है कि भाजपा ने पहले सड़क पर नाराजगी जताई, फिर नदी किनारे पर नाराजगी जताई। अब ताजमहल पर नाराजगी जता रहे हैं। जनता की बरगलाना आसान है लेकिन भाजपा के विकास रथ को रोकने का मतलब है कि सपा के लोग अपने स्तर पर विकास की गति को विस्तार दें। वे सरकार के विकास प्रयासों में रोड़ा अटकाने की बजाए उसके संपादन में सहयोग दें। राजनीति तो श्रेय-प्रेय की होती है। जब वे प्रदेश के विकास के लिए, शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए आगे बढ़कर आंदोलन करेंगे, सरकार पर विकास के लिए दबाव बनाएंगे तो जनता का उनके प्रति सहज ही आकर्षण बढ़ेगा। जहां तक सपा के उत्थान का सवाल है तो वह अखिलेश के गुमान से नहीं, बल्कि अपनों के मान और अखिलेश के काम से ही आगे बढ़ेगी। इस युग सत्य को समझे जाने की जरूरत है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।) 
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