संपादकीय
अपनों से घिरी केन्द्र सरकार : सुधांशु द्विवेदी
By Deshwani | Publish Date: 4/10/2017 2:45:52 PM
अपनों से घिरी केन्द्र सरकार : सुधांशु द्विवेदी

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने देश में गिरती विकास दर और बढ़ती हुई बेरोजगारी को लेकर केन्द्र की मोदी सरकार की आलोचना की है। उन्होंने नोटबंदी की तुलना आत्महत्या से करते हुए कहा कि वह भी एक साहसिक कदम है। शौरी द्वारा मोदी सरकार को ढाई व्यक्तियों वाली सरकार निरूपित करते हुए कहा गया है कि एक रात प्रधानमंत्री को आकाशवाणी हुई कि नोटबंदी किया जाए और उन्होंने ऐसा निर्णय ले लिया। शौरी का कहना है कि एक तरह से यह साहसिक कदम था। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि आत्महत्या भी एक साहसिक कदम है। उनका कहना है कि कि नोटबंदी के समर्थन में दी गई कौन-सी दलील व तर्क आज टिक रही है। सारा कालाधन सफेद हो गया? अरुण शौरी अपनी योग्यता, विद्वता और स्पष्टवादिता के लिये जाने जाते हैं तथा नोटबंदी के बाद देश में उपजे बदतर हालात के बीच अरुण शौरी भी वही कह रहे हैं जो अब तक बुद्धिजीवी, पत्रकार, खासकर विपक्षी राजनेता, पूर्व एवं कुछ मौजूदा नौकरशाह तथा अन्य जानकार कहते आये हैं। अब संभवत: केन्द्र सरकार की नुमाइंदगी करने वाले मंत्रियों, कुछ भाजपा नेताओं द्वारा शौरी को यह कहकर निशाना बनाया जाने लगेगा कि वह पार्टी में उपेक्षा के शिकार हैं, इसलिए वह विपक्षी राजनेताओं की भाषा बोल रहे हैं। इसके विपरीत हकीकत तो यह है कि अरुण शौरी पद की लालच से दूर बहुत ही स्वाभिमानी व्यक्ति हैं। वाजपेयी सरकार में जब उनको मंत्री बनाया गया था तो अटल बिहारी वाजपेयी के काफी आग्रह के बाद शौरी ने यह जिम्मेदारी स्वीकार की थी। ऐसे में भाजपा नेताओं द्वारा अब अगर अरुण शौरी को निशाना बनाया जायेगा तो इसे निश्चित तौर पर केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की गैर समझदारी व संस्कारविहीनता ही माना जायेगा। 

समय-समय पर केन्द्र की भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते आ रहे पूर्व वित्त एवं विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा भी कुछ इसी तरह के दौर से गुजर रहे हैं। पार्टी में उपेक्षा के शिकार यशवंत सिन्हा अगर मौजूदा समय में अपनी उपेक्षा एवं अपमान से आहत होकर भी केन्द्र सरकार की लानत मलानत कर रहे होते तब भी अरुण जेटली जैसे नेताओं को उन पर निशाना साधने का कोई हक नहीं है। यशवंत सिन्हा भाजपा के उन सजग शिल्पकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पार्टी की विचारधारा रूपी उर्वरता से राजनीतिक जमीन को हमेशा ही उपजाऊ बनाने का काम किया है। वह काम वोट बैंक के रूप में भाजपा के लिये काफी फायदेमंद साबित होता रहा है। झारखंड की हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आये यशवंत सिन्हा खासकर इस प्रदेश में भाजपा के खेवनहार ही माने जाते रहे हैं तथा उन पर यह कहकर भी निशाना नहीं साधा जा सकता कि उनके लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्हें केन्द्रीय वित्तमंत्री बनाया गया है, जैसा कि अरुण जेटली के बारे में विपक्षी राजनेताओं के साथ-साथ खुद भाजपा नेता कई बार दबी जुबान तो कई बार खुलकर कह चुके हैं। 

देश में जहां तक नोटबंदी व जीएसटी जैसे आत्मघाती निर्णयों का सवाल है तो अब इन निर्णयों के औचित्य पर सवाल उठाना तो अप्रासंगिक जैसा ही हो गया है तथा इन निर्णयों का दुष्प्रभाव अब तक इतना ज्यादा हो गया है कि अब इन निर्णयों से हुए नुकसान की भरपाई कैसे हो, यह प्रयास परिणाममूलक ढंग से किये जाने चाहिये। इसके लिये पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदंबरम्, आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन तथा यशवंत सिन्हा जैसे योग्य, अनुभवी और निपुण सख्शियतों की मदद ली जानी चाहिये। भाजपा नेता य केन्द्र सरकार संभवत: ऐसा नहीं करेंगे, क्यों कि उन्हें तो अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने और गलतियों को दुरूस्त कर व्यवस्था न सुधारने की आदत सी पड़ गई है। किसी भी तरह से चुनाव जीतने का मकसद तात्कालिक तौर पर तो फायदेमंद हो सकता है लेकिन इससे भरोसे व विश्वास का जो संकट बढ़ता है, उसकी भरपाई कैसे हो। शायद भाजपा के बड़े नेता यह भी नहीं समझ पा रहे हैं। किसी जगह का हैंडपंप खराब हो तो उसे सुधरवाने के बजाय सिर्फ हैंड सुनकर हाथ का इलाज करने की जुगत भिड़ाने लगना या हम इस दिशा में काफी प्रयास कर रहे हैं, यह कहने लगना आश्चर्य का विषय तो होता ही है, साथ ही इससे जग हंसाई भी बहुत होती है।केन्द्र की मौजूदा सरकार कुछ ऐसे ही काम कर रही है। केन्द्र सरकार व भाजपा नेता गाय व गोबर की चिंता भले ही अपने राजनीतिक फायदे के लिये करते रहें लेकिन उन्हें मानव जीवन की अहमियत तो समझनी ही पड़ेगी क्यों कि मानव जीवन इन दोनों की अपेक्षा ज्यादा अनमोल है। देश से गरीबी, भुखमरी तथा हर तरह का भेदभाव मिटाने की दिशा में अगर केन्द्र सरकार व भाजपा नेता ईमानदारीपूर्वक काम करते तो शायद उन्हें अपने राजनीतिक फायदे के लिये किसी तरह के अतिरंजित प्रयासों की जरूरत ही नही पड़ती लेकिन जो किया जा रहा है वह सर्वथा विपरीत ही किया जा रहा है। वैसे देश में स्थिति चाहे मौजूदा दौर में जितनी भी जटिल हो चुकी हो लेकिन अगर कुटिलता से मुक्त रहकर कुछ प्रयास किये जाएं तो परिणाम उम्मीदों के अनुरूप ही आयेंगे।

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