संपादकीय
अयोध्या में विवादित भूमि पर शिया-सुन्नी फिर आमने-सामनेः सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 22/8/2017 3:41:03 PM
अयोध्या में विवादित भूमि पर शिया-सुन्नी फिर आमने-सामनेः सियाराम पांडेय ‘शांत’

शिया-सुन्नी मुसलमानों के बीच मतैक्य का अभाव अक्सर रहा है। व्यवहार के धरातल पर दोनों नदी के दो किनारे हैं जो कभी मिल नहीं सकते। शिया और सुन्नी की विचारधारा ही नहीं, रहन-सहन में भी अंतर है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मामले में अब जब देश की सबसे बड़ी अदालत को निर्णय देना है, तब अचानक शिया समुदाय का संबंधित प्रकरण में कूद पड़ना विस्मयकारी तो है ही, सुन्नी वक्फ बोर्ड का खेल बिगाड़ने वाला भी है। शिया वक्फ बोर्ड के धार्मिक नेता कल्बे सादिक ने गत दिनों कहा था कि अयोध्या राम लला की है। विवादित स्थल पर उनका भव्य मंदिर बनना ही चाहिए। न्यायालय से अगर मुस्लिम समाज के पक्ष में निर्णय हो जाता है तो भी उन्हें बड़े दिल का परिचय देना चाहिए और विवादित भूमि हिंदुओं को सौंप देनी चाहिए जिससे कि वहां भव्य राम मंदिर का निर्माण हो सके। यह अलग बात है कि कल्बे सादिक की इस राय पर मुस्लिम समाज की ओर से बेहद तीखी प्रतिक्रिया आई और यहां तक कहा गया कि किसी मौलाना के कह देने भर से मस्जिद की भूमि हिंदुओं को नहीं सौंपी जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला निर्णय के अंतिम पायदान पर है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने पिछली सुनवाई के दौरान हिंदुओं और मुस्लिमों को यह राय दी थी कि वे आपसी सहमति से मिल-बैठकर इस संवेदनशील मसले का समाधान निकालें। उत्तर प्रदेश सरकार, भाजपा, संघ और विश्व हिंदू परिषद के लोग भी चाहते थे कि इस मरहले का समाधान आपसी सहमति से हो जाए लेकिन मुस्लिम समाज इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ और उसने खुलकर इस बात का ऐलान किया कि उसे केवल अदालत का निर्णय ही स्वीकार्य है। मतलब गेंद फिर सर्वोच्च न्यायालय के पाले में आ गई है। वरिष्ठ भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने देश की सबसे बड़ी अदालत में याचिका दायर की है कि इस मामले में नियमित सुनवाई कर निर्णय सुनाया जाए। इस बीच शिया समाज ने सर्वोच्च न्यायालय में एक नया हलफनामा पेश कर दिया और यह बताने की कोशिश की है कि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में असल पक्षकार शिया समाज ही है। सुन्नी वक्फ बोर्ड का मालिकाना हक का दावा झूठा है। शिया वक्फ बोर्ड के इस दावे ने इस संवेदनशील मामले में नया मोड़ ला दिया है। सुन्नी शिया समाज के दावों को गलत ठहरा रहे हैं और शिया समाज सुन्नियों के दावे को। कौन सच है और कौन गलत, यह तो अदालत को तय करना है लेकिन शिया समाज ने जिस तरह ‘विवादित स्थल पर मस्जिद हो ही नहीं सकती’ जैसा जुमला उछाला है,उससे तो यही लगता है कि देर-सबेर राम मंदिर विवादित भूमि पर बन जरूर जाएगा। 

सुन्नी समाज और उसके नेता भले ही इस मुद्दे पर आम सहमति की अवधारणा के विपरीत हो लेकिन शिया वक्फ बोर्ड का हालिया रुख तो यही बताता है कि वह आपसी सहमति के जरिए इस समस्या का समाधान चाहता है। शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी की मानें तो विवादित भूमि पर मस्जिद बनाया जाना जायज नहीं है। बल प्रयोग कर मस्जिद बनाना इस्लाम के खिलाफ है। अयोध्या में मंदिर बनना चाहिए, जबकि मस्जिद दूसरी जगह मुस्लिम इलाके में बनाई जाए। मस्जिद का नाम आक्रमणकारियों के नाम पर रखने के बजाए मस्जिद-ए-अमन रखा जाए। ईरान और इराक से मंगाए गए फतवों में भी मस्जिद को दूसरी जगह बनाने की हिमायत की गई है। जब विवादित ढांचा मौजूद था तब भी यही कहा जाता था कि विवादित भूमि पर बनी मस्जिद में नमाज अदा नहीं की जा सकती लेकिन इसके बाद भी मुस्लिम समाज इस भूमि पर से अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं था। अब जब शिया वक्फ बोर्ड ने भी मुस्लिमों को इस्लाम का आईना दिखा दिया है तो फिर इस पर विचार तो किया ही जाना चाहिए। 

 

हिंदुओं की ओर से, सरकार की ओर से मुसलमानों को बराबर इस बात के लिए समझाया जाता रहा है कि अगर वे विवादित स्थल पर अपना दावा छोड़ दें तो सरकार उनके लिए अलग से मस्जिद बनवा देगी। पहली बात तो यह तय होनी चाहिए कि विवादित भूमि किसकी है। यह सच है कि अयोध्या में राममंदिर पर बलात कब्जा कर वहां मस्जिद बनाई गई और इसे लेकर हिंदू राजाओं और मुगल सेना के बीच लंबे समय तक संघर्ष होते रहे। हिंदुओं को राम लला का मंदिर मुगलों के कब्जे से छुड़ाने के लिए अनेक बार अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। राम मंदिर पर कब्जा पाने के लिए लाखों हिंदू सैनिक मारे गए। कारसेवा करने पहुंचे हिंदुओं पर उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सरकार ने गोली चलाने के आदेश दिए थे जिसमें कई हिंदू कारसेवक मारे गए थे। इसकी देश भर में आलोचना हुई थी। इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप कारसेवकों ने 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे को जमींदोज कर दिया था। तब से लेकर आज तक रामलला टेंट में हैं। बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षकार हासिम अंसारी ने भी अनेक बार कहा था कि रामलला को टेंट में देखकर उन्हें दुख होता है। वे चाहते हैं कि उनके जीते जी इस मामले का निपटारा हो जाए। वे आज हमारे बीच नहीं हैं। महंत रामचंद्र परमहंस भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। इन्हीं दोनों ने इस मामले को कोर्ट में पहुंचाया था। इसके बाद भी अगर यह मामला आज तक नहीं सुलझा है और अभी भी इसे लंबा खींचने की कुछ पक्ष साजिश कर रहे हैं तो सर्वोच्च न्यायलय को इस पर भी गौर करना चाहिए। 

 

गौरतलब है कि गत 11 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई हुई थी जिसमें सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि अभी दस्तावेजों का अनुवाद नहीं हो पाया है, इसलिए उन्हें पेश नहीं किया जा सकता। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले के लिए जुटाए गए सबूतों के अनुवाद हेतु उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को तीन महीने का वक्त दिया था। मामले की सुनवाई अब पांच दिसंबर को होनी है। इस मुकदमे से संबद्ध ऐतिहासिक दस्तावेज अरबी, उर्दू, फारसी, पाली और संस्कृत समेत आठ भाषाओं में हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर की स्पेशल बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। इस मामले में 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ भी सुनवाई शुरू होनी है। डेढ़ घंटे तक विचार के बाद बेंच की इस मुद्दे पर एक राय हुई थी। इस फैसले के खिलाफ 13 अपील दायर की गई हैं।

30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल, एसयू खान और डीवी शर्मा की पीठ ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुनाते हुए 2.77 एकड़ विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। पीठ ने तय किया था कि जिस जगह पर रामलला की मूर्ति है, उसे रामलला विराजमान को दे दिया जाए। राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़े को दे दी जाए। बचा हुआ एक-तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाए। इस फैसले में शिया वक्फ बोर्ड की कोई जगह नहीं थी। आठ अगस्त, 2017 को शिया वक्फ बोर्ड ने पहली बार सुप्रीम कोर्ट में ही शपथपत्र दाखिल किया था कि अयोध्या में विवादित जगह उसकी प्रॉपर्टी है और वहां राम मंदिर बनाया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी की ओर से दायर इस शपथपत्र में कहा गया था कि अयोध्या स्थित विवादित ढांचे पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा गलत है। यह मस्जिद मीर बाकी ने बनवाई थी। वह शिया था। मस्जिद बनने के बाद से जितने भी मुतवल्ली रहे हैं, सब शिया बोर्ड से ही रहे हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है। बाबर तो कभी अयोध्या गया ही नही था। बाबरनामा में भी ऐसा कोई जिक्र नहीं है। ऐसे में इस मस्जिद पर शियाओं का हक है। इससे जुड़े फैसले भी शिया बोर्ड ही लेगा। सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे में उत्तरप्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को पार्टी बनाना गलत है। 

 

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के जफरयाब जिलानी ने शिया वक्फ बोर्ड को ज्यादा अहमियत देने से इनकार किया था। उन्होंने शिया वक्फ बोर्ड के इस शपथपत्र को कानूनी हिसाब से महत्वहीन करार दिया था। यह अलग बात है कि सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इसे शिया समाज की ओर से दिया गया एक बेहतरीन संदेश कहा था। सुन्नी समाज के मौलानाओं ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की थी कि अगर विवादित भूमि शियाओं की है तो वह अदालत में इसकी पैरवी क्यों नहीं कर रहे थे। इसके जवाब में यह कहना मुनासिब होगा कि शिया वक्फ बोर्ड अयोध्या मामले में प्रतिवादी रह चुका है और उसका नंबर 24 है। यह अलग बात है कि उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुनवाई में हिस्सा नहीं लिया था। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया है कि इस मामले से जुड़े कुछ पक्षकारों का निधन हो गया है, इसलिए उन्हें बदलने की जरूरत है। कुल मिलाकर कपिल सिब्बल की योजना मामले को और लंबा खींचने की है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांट दिया था। इस पर हिंदुओं ही नहीं , मुसलमानों को भी आपत्ति थी। रामलला विराजमान की तरफ से सबसे पहले हिन्दू महासभा इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गई थी। इसके बाद सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद कई और पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कर दी थी। इन सभी याचिकाओं पर विचार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 9 मई, 2011 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। तब से यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। अब देखना यह होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में किसे मूल पक्षकार मानता है शिया समाज को या सुन्नी समाज को। पहली बात तो यह कि जब शिया समाज खुद कह रहा है कि अयोध्या राम लला की है तो वहां जबरन मस्जिद बना देने भर से मस्जिद की जमीन उसकी कैसे हो जाती है? कब्जे की भूमि पर किसी का भी मालिकाना हक तो होता नहीं। पुरातात्विक खुदाई में भी इस बात के प्रमाण मिल चुके हैं कि मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद बनाई गई थी। यह मामला निर्मम और तटस्थ निर्णय की मांग करता है। यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय कौशल की परीक्षा भी है। इस निर्णय पर पूरे देश की नजर है। यह आस्था से जुड़ा मामला है। इसमें विलंब उचित नहीं है। पक्षकारों को जोड़ना है। नए पक्षकार बनाने हैं तो भी इस मामले में लगातार सुनवाई होनी चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर इस मामले में नीर-क्षीर विवेक किया जाना चाहिए। 

 

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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