संपादकीय
फिर भी राजनीति के केंद्र में हैं लालू : सुधांशु द्विवेदी
By Deshwani | Publish Date: 3/8/2017 8:12:12 PM
फिर भी राजनीति के केंद्र में हैं लालू : सुधांशु द्विवेदी

 बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पाला बदलकर भाजपा के साथ सरकार बना ली तथा विधानसभा में अपना बहुमत भी सिद्ध कर लिया। ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि आखिर नीतीश कुमार की उस अघोषित महत्वाकांक्षा का क्या होगा जिसके तहत वह 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने का सपना पाले हुए थे। बिहार में लालू यादव की पार्टी राजद से अपनी राह अलग करके भाजपा के साथ सियासी पारी शुरू करने वाले नीतीश कुमार के इस निर्णय से खुद उनकी ही पार्टी के नेता शरद यादव ही खुश नहीं हैं। प्रबल संभावना है कि वह अलग पार्र्टी गठित करके लालू यादव के साथ सियासी जुगलबंदी करेंगे। नीतीश कुमार द्वारा उनके पाला बदलने के पीछे चाहे जिन परिस्थितिजन्य कारणों का हवाला दिया जाए लेकिन बिहार में पिछले दिनों हुए बड़े राजनीतिक उलटफेर में ज्यादा फायदा भाजपा को ही हुआ है। नीतीश कुमार तो सिर्फ मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे। कहा जाता है कि राजनीति में कोई किसी का स्थायी रूप से दोस्त या दुश्मन नहीं हुआ करता तथा देश में मौजूदा दौर में एक ऐसा प्रचलन शुरू हो गया है कि राजनीतिक बिरादरी के लोग अपने सियासी हितों, सहूलियत व सुविधा के अनुसार खेमे बदलने में जरा भी देर नहीं करते। इस माहौल में संकटग्रस्त होने के बावजूद लालू यादव ने एक अलग ही उत्कृष्ट तरह की मिसाल प्रस्तुत की है, जिसके तहत न तो वह भाजपा के सामने झुकने को तैयार हैं और न ही उनके खिलाफ केन्द्र सरकार द्वारा सत्ता के तथाकथित दुरुपयोग के बावजूद उनके चेहरे पर जरा भी शिकन है। बिहार की सत्ता से बेदखल होने के बाद लालू यादव अब और अधिक आक्रामक तथा उनकी पार्टी राजद ज्यादा सक्रिय हो गई है। नीतीश के लिए विडंबना की बात यह भी है कि उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर बिहार में सरकार बनाने के बाद जिन विधायकों को बतौर मंत्री अपने मत्रिमंडल में शामिल किया है, उनमें से अधिकांश दागी व आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि नीतीश कुमार का सुशासन बिहार में अब आगे कैसे कायम रह पायेगा? क्या वह बिहार को महागठबंधन से अलग होने के बाद फिर से उसी तरह का भयमुक्त वातावरण प्रदान कर पाएंगे, जैसे उन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले अपने चुनावी वादों में कहा था। खुद शरद यादव कह रहे हैं कि नीतीश को बिहार में जो जनादेश मिला था वह भाजपा के साथ गठबंधन करने के लिये नहीं था। हमने भाजपा व उसकी रीतियों-नीतियों की खिलाफत के लिए बिहार में जनादेश मांगा था। वहीं नीतीश कुमार के प्रति लालू की पार्टी राजद लगतार आक्रामक बनी हुई है। नीतीश सरकार के विश्वासमत के लिये राज्य विधानसभा में हुए शक्ति परीक्षण के दौरान विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने जिस ढंग से आक्रामक भाषण दिया, उसकी काफी तारीफ हो रही है। बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार के नए मंत्रिमंडल में करीब तीन चौथाई मंत्री दागी हैं, यानी इन सभी के ऊपर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से कुछ के खिलाफ तो काफी संगीन धाराओं के तहत मामले लंबित हैं। एक आकलन के अनुसार महागठबंधन सरकार के दौरान नीतीश मंत्रिमंडल में जितने दागी थे उससे भी ज्यादा दागी चेहरे अब उनके मंत्रिमंडल में हैं। रिपोर्ट स्पष्ट तौर पर बताती है कि नीतीश कुमार की नई सरकार में जिन 29 चेहरों को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई है, उनमें से 22 मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक केस चल रहे हैं। जबकि, महागठबंधन की बात करें तो उस वक्त 28 चेहरों में से 19 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन 22 मंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की घोषणा की है, उनमें से 9 मंत्रियों के खिलाफ बेहद संगीन धाराओं के तहत केस दर्ज हैं। नीतीश मंत्रिमंडल के दो मंत्रियों के खिलाफ हत्या की कोशिश के आरोप में भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के अंतर्गत केस दर्ज हैं। जबकि, कई अन्य मंत्रियों के विरुद्ध डकैती, चोरी, फर्जीवाड़ा और अत्याचार जैसे गंभीर मामले हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो जिस तथाकथित भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर नीतीश ने लालू यादव से अपना रास्ता अलग किया, उस तरह के भ्रष्टाचार के आरोप तो नीतीश के मंत्रिमंडलीय सहयोगियों पर भी हैं फिर नीतीश कुमार बिहार को भ्रष्टाचार व भय मुक्त बनाने का दावा कैसे कर सकते हैं। नीतीश मंत्रिमंडल के सदस्यों की शिक्षा-दीक्षा का स्तर भी बहुत अच्छा नहीं है। अगर इन मंत्रियों की शिक्षा की बात करें तो इस मामले में भी स्थिति ज्यादा बेहतर नजर नहीं आ रही है। एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नीतीश मंत्रिमंडल में शामिल 29 में से 9 मंत्रियों ने सिर्फ 8वीं से 12वीं के बीच ही पढ़ाई की है। यानी वे अंडरग्रेजुएट हैं। जबकि, 18 मंत्री या तो ग्रेजुएट हैं या फिर उच्च डिग्री हासिल की है। बिहार की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर अगर गौर करें तो राज्य की सत्ता से लालू भले ही बाहर हो गये हों लेकिन फिर भी विधानसभा में संख्या बल एवं राजनीतिक लोकप्रियता की दृष्टि से लालू चर्चा के केंद्र में अभी भी कायम है। 

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