संपादकीय
अमित शाह की लखनऊ यात्रा के सियासी निहितार्थः सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 1/8/2017 10:20:36 AM
अमित शाह की लखनऊ यात्रा के सियासी निहितार्थः सियाराम पांडेय ‘शांत’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हनुमान हैं अमित शाह। वे भाजपा के चाणक्य हैं। वे देश भर में भाजपा को मजबूत करने में जुटे हैं लेकिन उन्हें पता है कि केंद्र की राजनीति का सफर उत्तर प्रदेश से आरंभ होता है। इसलिए वे यूपी के दौरे पर भी रहे। दौरा तो उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का किया लेकिन इसी बहाने पूरे प्रदेश को मथ कर रख दिया। उनकी कोशिश है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में लंबी पारी खेले। इसके लिए उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया प्रबंधन, चुनाव प्रबंधन और जनता से जुड़े रहने के प्रभावी मंत्र भी दिए। सरकार, संगठन और संघ के लोगों से तो वे मिले ही, समाज के प्रबुद्ध जन से संवाद स्थापित करने में भी वे पीछे नहीं रहे। उन्होंने सभी को यह बताने की कोशिश की कि भाजपा भारत ही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी है। यही एक ऐसी पार्टी है जहां आंतरिक लोकतंत्र है। यूं तो देश में 1600 राजनीतिक दल हैं लेकिन कहीं भी आंतरिक लोकतंत्र नजर नहीं आता। कांग्रेस उनके निशाने पर रही। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को विदेशी बताने में भाजपा हमेशा आगे रही लेकिन लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस को ही विदेशी संगठन ठहराने की कोशिश की। उन्होंने तो यहां तक कहा कि इसकी नींव ही विदेशी व्यक्ति ने डाली है। उन्होंने यह संदेश भी दिया कि देश की आजादी के बाद कांग्रेस भारत का नव निर्माण चाहती थी जबकि भाजपा का प्रयास हमेशा यही रहा है कि इस देश का पुनर्निर्माण हो। देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मजबूत हो। ‘रोटी, कपड़ा और मकान, साथ-साथ नैतिक उत्थान’ की भावना भी बलवती हो। अपनी जड़ों से जुड़कर, अपनी माटी की सोंधी गंध अनुभूत कर ही कोई राष्ट्र अपनी संस्कृति और सभ्यता से जुड़े रह सकता है। अमित शाह ने कांग्रेस ही नहीं, बसपा और सपा में भी आंतरिक लोकतंत्र के अभाव की बात कही। उन्हें परिवार की पार्टी बताया। भाजपा को कार्यकर्ताओं की पार्टी बताकर जहां उन्होंने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया बल्कि उन्हें इस बात के लिए भी आश्वस्त किया कि यहां उनका भविष्य असुरक्षित नहीं है क्योंकि यहां चाय वाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। अन्य दलों में उत्तराधिकार चलता है जबकि भाजपा में व्यक्ति के ज्ञान और अनुभव को वरीयता दी जाती है। प्रबुद्ध वर्ग को उन्होंने आंकड़ों की रोशनी में यह समझाने-बताने की कोशिश की कि भाजपा क्यों अन्य दलों से बेहतर है? जिस दल में आंतरिक अनुशासन हो, नैतिक अनुशासन हो और सबके साथ, सबके विकास का भाव हो, वही दल इस देश को आगे ले जा सकता है। योगी आदित्यनाथ को उन्होंने शानदार मुख्यमंत्री कहा तो इस प्रदेश की जनता को इस बात का आश्वासन भी दिया कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा संकल्पपत्र जारी नहीं करेगी बल्कि जनता के सामने संकल्पपत्र के सभी वादों को पूरा करने की सूची जनता को देगी। यह अब तक का अमित शाह का सबसे बड़ा वादा है लेकिन ऐसा करके उन्होंने योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रियों पर विकास कार्यों को गति देने और कानून व्यवस्था ठीक करने का दबाव भी परोक्ष रूप से बना दिया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में सत्ता के स्थायित्व का सपना भी कार्यकर्ताओं को दिखाया। उन्हें अभी से 2019 की तैयारियों में जुट जाने, गांव-गांव, शहर-शहर, घर-घर जाने की नसीहत दी। मोदी और योगी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की बात कही। 

उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रियों को आईना दिखाने और घुड़की देने में भी वे पीछे नहीं रहे। उन्हें जनहित में विकास कार्य करने की नसीहत तो दी ही, लगे हाथ यह भी कह दिया कि जिसे लग रहा है कि ज्यादा काम है वह छुट्टी ले लें। मंत्री यह न सोचें कि सिर्फ पांच साल का कार्य है। उनका यह वक्तव्य उनकी बड़ी और दूरगामी सोच की ओर इशारा करता है। भाजपा की कोशिश अपने विकास कार्यो की बदौलत जन-जन के हृदय में उतर जाने की है। वह समाज के सभी वर्गों को अपने साथ साधे रखना चाहती है। अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के मंत्रियों को नसीहत दी है कि वे उत्तर प्रदेश की कार्य संस्कृति बदलने के लिए सोचें। देश के नक्शे पर सर्वश्रेष्ठ प्रदेश बनाने के लिए सोचें और यह भी सोचें कि इस सरकार की सिल्वर जुबिली मनानी है। सिल्वर जुबिली मनाने और यूपी को सर्वश्रेष्ठ बनाने का सपना उत्तर प्रदेश की राजनीति में देर तक बने रहने का सपना है। वे कार्यकर्ताओं के सम्मान की बात कहते नजर आए, उन्हें इस बात का अहसास दिलाने की बात कहते नजर आए जिससे उन्हें लगे कि यह सरकार हमारी है। अपनी इस बात को उन्होंने कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने की छूट देकर साबित भी किया। भाजपा अध्यक्ष ने अपने लखनऊ दौरे में अपनी ही नहीं सुनाई, कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की भी सुनी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने जिस तरह संगठन के पदाधिकारियों का गुबार फूटा और थाना, तहसील, खनन, आवास योजना के भ्रष्टाचार और बेलगाम अफसरों की बात उठी, शासन सत्ता के अहंकार की शिकायत हुई, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। एक जिलाध्यक्ष ने तो यहां तक कह दिया कि मुख्यमंत्री से मिलना आसान है लेकिन विधायक से मिलना बहुत कठिन है। उनके सामने पदाधिकारियों ने शिकायतों के अंबार लगा दिए लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि अमित शाह पहले पार्टी अध्यक्ष हैं जो पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से खुला संवाद कर रहे हैं। आंतरिक लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? यह पहला मौका था जब कार्यकर्ता राष्ट्रीय अध्यक्ष से थानेदार से लेकर लेखपाल तक की शिकायत कह रहे थे और वह भी बिना किसी उलझन के। जो समस्या स्थानीय स्तर पर सुलझ जानी चाहिए थी, वह अगर पार्टी अध्यक्ष को मुख्यमंत्री के सामने बताई जा रही थी तो इसके राजनीतिक मायने सहज ही निकाले जा सकते हैं। जाहिर सी बात है कि इससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी और अधिक काम करने का दबाव बढ़ेगा। भाजपा कार्यकर्ता सोनू यादव के यहां भोजन और छाछ का आनंद लेकर उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बिल्कुल नए तरह की डिनर डिप्लोमेसी शुरू की। दलितों को साधने का लक्ष्य बहुत हद तक पूरा हो चुका है लेकिन सोनू यादव के यहां भोजन के बाद अमित शाह ने मायावती के बाद अब मुलायम सिंह के राजनीतिक दुर्ग में सेंध लगाने की कोशिश की है। यादव जाति मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार की कट्टर समर्थक मानी जाती है। यादव परिवार में भोज कर अमित शाह ने अखिलेश और मुलायम के माथे की सलवटें गहरी कर दी हैं। शाम को मुख्यमंत्री आवास पर शाह का भोजन और इसमें मीडिया की सहभागिता यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि अमित शाह मीडिया प्रबंधन के मामले में भी किसी भी तरह की चूक न होने देने के पक्षधर हैं। जिस तरह उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों, मंत्रियों और कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया से जुड़े रहने को कहा है, उसका मतलब साफ है कि जनता से जुड़े रहकर ही भाजपा उसके दिलों पर राज कर सकती है। अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को यह भी समझाने की कोशिश की कि विगत डेढ़ दशक में प्रशासन का राजनीतिकरण हुआ है। हम नहीं चाहते कि किसी भी अधिकारी पर भाजपा का ठप्पा लगे। अफसर का मूल्यांकन उसकी प्रतिभा और योग्यता के आधार पर होना चाहिए।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाजपा के सत्ता में आने का का उद्देश्य समाज के आखिरी आदमी के चेहरे पर मुस्कान लाना है। सभी चीजें ठीक करनी हैं। अधिकारियों के राजनीतिकरण का पाप भाजपा को नहीं करना है। 

उत्तर प्रदेश के अधिकारियों पर शिकंजा कसने पर भी उन्होंने बल दिया यह कहकर कि विगत 15 साल से संविधान के अनुरूप काम करने की अधिकारियों की आदत बिगड़ गई है। उसमें बदलाव लाना है। भाजपा को उत्तर प्रदेश की कार्यसंस्कृति बदलनी है। वे यह कहने में भी नहीं चूके कि उत्तर प्रदेश अभी एक पड़ाव है। यह भाजपा का सर्वोच्च नहीं है। सर्वोच्च आना शेष है। हमें उत्तर प्रदेश को स्थायी रूप से जीतना है। हर कार्यकर्ता को मालूम होना चाहिए कि वह राजनीति में क्यों आया है? मूल काम संगठन को मजबूत करना है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को लक्ष्य सौंपा। अमित शाह ने कहा कि केन्द्र और राज्य की योजनाओं के जरिए गरीबों की सहायता करते हुए उन्हें भाजपा से जोडने का प्रयास करना है। यूपी में सरकार का निर्माण किसी को मुख्यमंत्री और मंत्री बनाने के लिए नहीं हुआ है। यह 22 करोड़ लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए हुआ है। यह सरकार किसी व्यक्तिगत काम के लिए नहीं है। सरकार से संगठन नहीं बल्कि संगठन से सरकार है। संगठन का लक्ष्य अन्त्योदय है। लोकतंत्र की मजबूती, उत्तर प्रदेश को बीमारू राज्य से बार निकालने, संगठन की मजबूती पर फोकस करने जैसे विमर्श बिंदु देकर उन्होंने भाजपा जन के लिए अनुशासन और मर्यादा की एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है।अनुशासन के बल पर ही भाजपा खुद को और प्रदेश को आगे ले जा सकती है। अमित शाह की लखनऊ यात्रा का लबोलुआब यही रहा है। अगर भाजपा उनके मंत्र पर काम करती है, प्रशासन और विधि व्यवस्था अनुकूल हो जाती है तो राजनीति के राजपथ पर भाजपा का अजेय रथ निर्बाध दौड़ता रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

(लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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