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अधिक रसायनिक उर्वरक के प्रयोग से दलहनी फसलों पर पड़ रहा कुप्रभाव
By Deshwani | Publish Date: 21/10/2017 12:36:57 PM
अधिक रसायनिक उर्वरक के प्रयोग से दलहनी फसलों पर पड़ रहा कुप्रभाव

लखनऊ, (हि.स.)। दलहनी फसलों में अधिक रसायनिक उर्वरक के इस्तेमाल से फसलों पर संकट आ रहा है। इससे उत्पादन क्षमता तो घट ही रही है साथ में इसका स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। दलहनी फसलों को बढ़ावा देने का काम सरकार तेजी से भले कर रही हो पर किसानों को जागरूक होना भी बेहद जरूरी है। प्रदेश के कृषि अनुसंधान परिषद के बृजेन्द्र कुमार के मुताबिक दलहनी फसलों पर अधिक उर्वरक डालने से उनके जननद्रव्य में परिवर्तन होने से दालों के दानों की कम उपज हो रही है। 

उन्होंने कहा कि दलहनी फसलें जलवायु के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। सूखा, पाला, घटता-बढ़ता तापमान दलहनी फसलों पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है जिससे इसकी पैदावार घट रही है। देश में रबी सीजन में ही दलहनी फसलों की खेती अधिक होती है, जिसमें चना, मटर, मसूर की खेती प्रमुख होती है।

कुमार की माने तो नाइट्रोजन उर्वरकों के सही उपयोग का समय पौधे की तेज वृद्धिकाल अवस्था होती है। प्रायः बिजाई के समय तथा वृद्धि के पहले 25-50 दिनों में प्रयोग करने से अधिक लाभ मिलता है। बिजाई के समय अन्य तत्वों के उर्वरकों के साथ मिलकर बीज से नीचे या बगल में 2 से.मी. की दूरी पर पोरें। रेतीनी जमीनों में सिंचाई के बाद तथा भारी जमीनों में सिंचाई से पहले प्रयोग करें। रेतीली जमीनों में खोदी-गुड़ाई करके उर्वरकों को मिट्टी में मिला देना चाहिये। सर्दियों में ओस उतरने के बाद तथा गर्मियों में व बरसात में दोपहर बाद उर्वरकों को छिड़कना चाहिये।

उन्होंने कहा कि अधिकतर दलहन का उपयोग उच्च प्रोटीन उपलब्धता के कारण किया जाता है लेकिन अधिक प्रोटीन देने वाली प्रजातियां कम उत्पादकता वाली होती हैं। ऐसे में अधिक प्रोटीन के साथ अधिक उत्पादन करने वाली प्रजातियों का विकसित करने की जरुरत है।

उत्तर प्रदेश के कृषि उपनिदेशक एस.के. सिंह की माने तो दलहनी फसलें प्रकाश और तापमान के प्रति अधिक संवदेनशील होती हैं। ऐसे में इसमें अगर मौसम में जरा सा भी परिवर्तन होता है तो उसका असर इन फसलों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि धान्य फसलों स्टार्च की पूर्ति के लिए उगाई जाती हैं जबकि दलहनी फसलें प्रोटीन से भरपूर बीजों के लिए उगाई जाती हैं। 

यूरिया का अधिक मात्रा में किया गये प्रयोग से मौजूद नाइट्रोजन हवा में उड़ जाती है या रासायनिक क्रियाओं द्वारा उसका क्षय हो जाता है। कुछ यूरिया सिंचाई के पानी के साथ बहकर आस-पास के जलाशयों में पहुंच जाता है या रिसाव के द्वारा भू-जल को प्रभावित करता है। इस तरह भूमिगत जल नाइट्रोजन प्रदूषण का शिकार हो जाता है, जिसके कई नुकसान हैं। अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में भू-जल को पेय जल के रूप में इस्तेमाल करने के कारण इससे ग्रामीण आबादी का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार खेत में यूरिया की अधिक मात्रा जलवायु परिवर्तन जैसी विपदा को भी बढ़ावा देती है, जिसका पैदावार पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

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