संपादकीय
अष्ट सिद्धियों की रात है दीपावली : सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 17/10/2017 3:29:37 PM
अष्ट सिद्धियों की रात है दीपावली : सियाराम पांडेय ‘शांत’

दीपावली की रात सामान्य रात नहीं है। यह महानिशा है। यह ऐसी रात है जिसमें अंधेरा नहीं है। दीपावली धन और समृ़िद्ध की रात तो है ही,वह विवेक और बुद्धि की भी रात है। शुभ और लाभ की भी रात है। वह ऋद्धि और सिद्धि की रात है। यह तंत्र की रात है। मंत्र की रात है और यंत्र की रात है। हर तरह की सिद्धियां इस दिन सहज प्राप्त होती है। अष्ट सि​द्धियां भी साधक चाहे तो इस दिन सहज संप्राप्त कर सकता है। बशर्ते की वह शारीरिक और मानसिक दृष्टि से खुद को सवच्छ रख सके। 
 
दीपावली स्वच्छता का पर्व है। दीपावली हर साल आती है। लोग इस दिन लक्ष्मी की आराधना भी करते हैं लेकिन इसके बाद भी बहुतों की दरिद्रता कम नहीं होती तो इसका मतलब यह है कि लक्ष्मी व्यक्ति की कर्मठता, ईमानदारी, बहादुरी और जिम्मेदारी से आती है। लक्ष्मी के सहस्त्र रूप हैं। वह सर्वव्यापी हैं। विशेष रूप से उन्हें धन लक्ष्मी, स्वास्थ्य लक्ष्मी, पराक्रम लक्ष्मी, सुख लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, शत्रु निवारण लक्ष्मी, आनंद लक्ष्मी, दीर्घायु लक्ष्मी, भाग्य लक्ष्मी, पत्नी लक्ष्मी, राज्य सम्मान लक्ष्मी, वाहन लक्ष्मी, सौभाग्य लक्ष्मी, पौत्र लक्ष्मी और राधेय लक्ष्मी के नाम से जाना जाता है। 
 
 
दीपावली पर्व ज्ञान और विज्ञान का पर्व है। अंधेरे में उजाला करना बड़ा काम है। जीवन में किसी भी तरह का अंधकार न आए, इसलिए खुद को ज्योतित और प्रकाशित करने का पर्व है दीपावली। यह दीप से दीप जलाने और संसार में प्रेम की गंगा बहाने का पर्व है। दीपावली ऐसा पर्व है जिस दिन मनुष्य ही नहीं, देवता भी दीपावली मनाते हैं और श्री-समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं। दीपावली सर्वप्रथम त्रेता में मनाई गई या सतयुग में, इसे लेकर मतभेद हो सकता है। जब भगवान विष्णु ने बलि को पाताल लोक भेजा था तब भी और जब भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध किया था तब भी दीपावली मनाई गई थी। वह तिथि पर कार्तिक अमावस्या ही थी। मत्र्यलोक और देवलोक दीपों के प्रकाश से जगमगाए थे। त्रेता युग में राम के स्वागत में अयोध्या में दीपावली मनाए जाने के बाद भारत भर में यह पर्व लोकप्रिय हो गया है। जिस तरह हरिकथा का कोई अंत नहीं है, उसी तरह दीपावली को लेकर भी संसार में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। इस देश में दीपावली मनाने की शुरुआत अयोध्या से मानी जाती है। लंकापति रावण को मारने के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे थे तो उस दिन कार्तिक अमावस्या थी और उनके स्वागत के लिए अयोध्या को दीपों से जगमग किया गया था। दूल्हन की तरह सजाया गया था तब से आज तक भारतवासी दीपावली मनाते आ रहे हैं। दीपावली मनाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि कार्तिक मास की अमावस्या को ही समुद्र से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं। त्रयोदशी को धनवंतरी और द्वादशी को कामधेनु का जन्म हुआ था। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस अमावस्या से पितरों की रात आरम्भ होती है। कहीं वे मार्ग भटक न जाएं, इसलिए उनके लिए प्रकाश की व्यवस्था धरती पर दीपक जलाकर की जाती है। इस दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक भी हुआ था। विक्रम संवत की शुरुआत भी इसी दिन से मानी जाती है। सतयुग में इसी दिन वामन रूप विष्णु भगवान ने तीन पग में पृथ्वी नाप कर असुरराज महादानी बलि के अहंकार का विनाश किया था। महाराज बलि के पाताल लोक चले जाने पर स्वर्ग को सुरक्षित जान इस दिन देवराज इंद्र ने स्वर्ग में दीपावली मनाई थी। इस दिन लक्ष्मी पूजन का भारतीय परम्परा में विशेष महत्व हमेशा से रहा है।
 
दीप प्रकाश का वाहक है। सकारात्मकता और चैतन्यता का वाहक है। वह उजाले का प्रतीक है। दीपावली जीवन को देखने का नजरिया है। तंत्र ग्रंथों में लक्ष्मी को ‘सकार’ या ‘श्रृंकार’ कहा गया है। “सकार” यानी भौतिक समृद्धि, जड़ समृद्धि। लक्ष्मी की कृपा की बदौलत ही धरती पर खान-पान का वैभव आता है। लोक में यश और प्रतिष्ठा बढ़ती है। आनंद, ऐश्वर्य, उल्लास और समृद्धि के सूत्र प्रकट होते हैं। लक्ष्मी धन, संपदा, समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी हैं। उनकी उपासना-आराधना से मन-मस्तिष्क जागृत होता है। मनुष्य की प्रसुप्त चेतना क्षमता जागती और सक्रिय होती हैं। धन व समृद्धि का त्योहार है। 
लक्ष्मी कमल पर विराजित होती हैं। कमल स्वयं में ही मधुरता का प्रतीक है जो कीचड़ में उत्पन्न होकर भी उपासना में शामिल है। त्याज्य पदार्थों से घिरा होने के बावजूद भी मासूम है, कोमल है, पवित्र है। लक्ष्मी स्त्री स्वरूपा हैं क्योंकि स्त्री स्वयं में शक्ति का पुंज है। लक्ष्मी का एक मुख और चार भुजाएं दरअसल एक लक्ष्य और चार विचारों (दूर दृष्टि, दृढ़ संकल्प, नियम-अनुशासन तथा परिश्रम) की ही अभिव्यक्ति हैं। इसलिए लक्ष्मी साधकों को अपने चिंतन और व्यवहार में कमल सी कोमलता लानी चाहिए। इसके बिना लक्ष्मी पूजन का लक्ष्य पूरा नहीं होता। दीपावली पर देवी लक्ष्मी के साथ एकदंत मंगलमूर्ति गणेश की पूजा की जाती है। पूजन स्थल पर लक्ष्मी व गणेश के पीछे शुभ-लाभ लिखा जाता है। बीच में स्वास्तिक बनाया जाता है। लाभ में भी शुभता हो। मतलब लक्ष्मी पूजन सात्विक तरीके से लाभ प्राप्त करने का संदेश देता है। धन का प्रचुर मात्रा में होना ही ऐश्वर्य और सुख का परिचायक नहीं है। बुद्धि और विवेक के अभाव में धन व्यक्ति के पराभव का भी कारण बन सकता है। लक्ष्मी की मुद्रा में समाहित संदेश शायद यही है कि यदि दूरदृष्टि और दृढ़ संकल्प के साथ अनुशासन पूर्वक पूर्ण शक्ति व सामथ्र्य से किसी भी कार्य को किया जाए तो सफलता अवश्य उसका चरण चुम्बन करती है और लक्ष्मी सदैव उसके पास विराजमान रहती हैं। लक्ष्मी की वरमुद्रा से अनुग्रह और अभय तथा दान मुद्रा से उनकी उदारता का बोध होता है। उनके हाथ में कमल उनके सौंदर्य को परिलक्षित करते हैं। लोग कहते हैं कि लक्ष्मी का वाहन गरुण है लेकिन जब वे विष्णु के साथ होती हैं तो गरुण पर और गणेश के साथ होती हैं तो गज पर सवार होती हैं। इस तरह उनके तीन वाहन हैं- उलूक, गज और गरुण। उलूक नकारात्मक परिस्थितियों में सकारात्मक सोच का प्रतीक है। वह भीड़ से हटकर विचार करने की शक्ति का प्रतीक है। वह तब देखने की क्षमता रखता है जब सामान्य जन को नजर नहीं आता। उलूक निर्भयता व क्षमता का भी द्योतक है। हाथी बुद्धिमत्ता व शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वह शक्तिशाली परंतु विनम्र है। इससे ध्वनित होता है कि शक्ति विनम्रता में ही अच्छी लगती है। गरुण अपनी दूरदृष्टि, एक लक्ष्यता, दृढ़ता और कुशलता का प्रतीक है। चित्र में दो गजराज लक्ष्मी का अभिषेक करते नजर आते हैं। ये दो गजराज मनोयोग और श्रम का संकेत देते हैं। अगर लक्ष्मी को व्यावहारिक रूप से समझें तो लक्ष्मी भौतिक संसाधन प्राप्ति की वह क्षमता हैं, जो दूरदृष्टि, अलग सोच, मनोयोग, संकल्प शक्ति, श्रम, अनुशासन, विनम्रता, उदारता और अभयता से ही प्राप्त होती है। स्वयं के अन्दर परिवर्तन किए बगैर लक्ष्मी की प्राप्ति संभव नहीं है। दीपावली दरअसल लक्ष्य सिद्धि का काल है। चेतना को चेतन से जोड़ने का वक्त है। स्वयं के उत्थान का समय है।
 
दीपावली पूर्व लोग अपने घरों को खूब सजाते हैं ताकि लक्ष्मी प्रसन्न होकर उनके घर में प्रवेश करें। लेकिन कई बार घर को ज्यादा सजाने के चक्कर में वे वास्तुदोष उत्पन्न कर बैठते हैं। किसी भी व्यापार के विस्तार में ‘धनात्मक ऊर्जा’ बहुत मायने रखती है। ‘धनात्मक ऊर्जा’ का संबंध धन से भी होता है। धन के अभाव में न परिवार खुश रहता है और न ही व्यापार बढ़ता है। माता लक्ष्मी उसी के घर में आती हैं जिसका घर साफ-सुथरा होता है। वास्तु के हिसाब से काली चैदस यानी की दिवाली के दूसरे दिन भी घर को साफ करना चाहिए। जिन लोगों के घर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा की ओर है उन्हें मुख्य द्वार पर पिरामिड या लक्ष्मी-गणेश की तस्वीर लगानी चाहिए। आपके घर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर है तो उत्तर पू्र्व दिशा को विशेष रूप से सजाना चाहिए। टीवी और फ्रीज को उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके लगाएं। ड्राइंग रूम में भारी समानों को दक्षिण या पश्चिम दिशा की दीवार से सटाकर रखें। घर के दरवाजे पर मां लक्ष्मी के पैर का चिन्ह जरूर लगाने चाहिए। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि पैर की दिशा अंदर की तरफ होनी चाहिए। घर के दरवाजे पर चांदी का स्वस्तिक लगाना बेहद शुभ माना जाता है। इससे घर में बीमारी नहीं आती। पानी में नमकमिलाकर घर के कोने-कोने में छिड़कने से भी वास्तुदोष खत्म होता है। नमक घर की बुरी ऊर्जा को सोख लेता है। घर में उत्तर दिशा को कुबेर स्थान कहा जाता है। दिवाली में माता लक्ष्मी की मूर्ति उत्तर दिशा में ही रखनी चाहिए। 
 
पुराणों में वर्णित है कि इस दिन मध्यरात्रि के समय महालक्ष्मी सदगृहस्थों के घरों में विचरण करती हैं, इसलिए इस दिन घर को खूब साफ-सुथरा रखा जाता है। दीपावली मनाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर वहां स्थाई रूप से निवास करती हैं। दीपावली अनीति, आतंक और अत्याचार के अंत का प्रतीक पर्व है। यह मर्यादा, नीति और सत्य की प्रतिष्ठापक निशा भी है। दीपावली स्वास्थ्य चेतना जगाती है। स्वच्छता और स्वास्थ्य एक दूसरे के पूरक जो हैं। त्रयोदशी धन और स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरि की जयंती के रूप में मनाई जाती है। चतुदर्शी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। इसी दिन हनुमान जी का जन्म भी हुआ था। मतलब स्वछ व्यक्ति ही स्वस्थ रह सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही शक्तिशाली बन सकता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत व्यक्ति ही लक्ष्मी को पाने का अधिकारी होता है। जीवन में जो इस सूत्र को नहीं समझता, दुखी रहता है। इसमें शक नहीं कि व्यक्ति के अंदर अज्ञानरूपी अंधकार छाया हुआ है जबकि दीपक आत्म ज्योति का प्रतीक है। अतः दीप जलाने का तात्पर्य है- अपने अंदर को ज्ञान के प्रकाश से भरना जिससे तन और मन जगमगा उठे। अंधकार से सतत् प्रकाश की ओर बढ़ते रहना ही इस दीपावली पर्व की महाप्रेरणा है। दीपावली धनतेरस, नरक चतुर्दशी, मुख्य दिवाली-लक्ष्मीपूजन, गोवर्धन पूजन एवं यम द्वितीया या भाई दूज आदि पंच दिवसीय पर्वों का समूह है जो स्वयं में एक जीवन-दर्शन है। 
 
मानव जीवन का पहला मूल मंत्र निरोगी काया ही है। धन्वन्तरि जयंती अर्थात धनतेरस इसका संदेश देता है। नरक चतुर्दशी अर्थात नरकासुर का नाश। महाकाली पूजा यानी अज्ञान, अनाचार, अत्याचार, सामाजिक, मानवीय व मानसिक हीनता-दुर्बलता पर विजय। नकारात्मक प्रवृत्ति, दुष्टता और अहंकार का विनाश। यह पर्व मानसिक स्वास्थ्य व सामाजिक स्वास्थ्य की प्रतिष्ठा तो है ही, शक्ति और क्षमता की आराधना का भी पर्व है। महाकाली वस्तुतः आदि-मूल शक्ति है। वैदिक नीला सूक्त के अनुसार आदि-ब्रह्म रूप महाविष्णु की तीन पत्नियां भूदेवी, श्रीदेवी एवं नीला देवी हैं। भूमि एवं समस्त प्रकृति रूप श्री, ऐश्वर्य, धन-धान्य, समृद्धि ,ऋद्धि-सिद्धि-प्रसिद्धि, यश-कीर्ति रूपी मूलतः दृश्य रूप हैं। नीला देवी आदि मूल शक्ति हैं जो कभी योगमाया, कभी भगवती, कभी सहचरी-सखी आदि विविध रूपों में प्रकट होती हैं। महाकाली ही आदि-मूल शक्ति हैं जिनकी रावण वध हेतु पूजा राम करते हैं। द्वापर में उत्पन्न भौमासुर का वध भी इसी दिन श्रीकृष्ण ने पत्नी सत्यभामा की सहायता से किया था एवं बंधक बनाई हुई 16 हजार स्त्रियों को मुक्त कराया था जो विश्व मानव इतिहास में नारी-उद्धार का सर्वप्रथम उदाहरण था। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के बाद ही ज्ञान के प्रकाश द्वारा धन-धान्य, यश-कीर्ति, सिद्धि-श्री प्राप्ति की आशा की जा सकती है। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का यह उपनिषदों का संदेश पर्व है। इस दिन धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी, धनपति कुबेर, विघ्न-विनाशक गणेश और विद्या एवं कला की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। शक्ति और ज्ञान, धन और मन का पर्व है दीपावली। इसे मनाएं। दीप जलाएं लेकिन यह भी देखें कि धरती पर कहीं भी किसी भी तरह का अंधकार शेष न रहे। 
(लेखक हिंदुस्थान समाचार से जुड़े हैं।) 
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